Motivational & Inspirinig कविताएं हिन्दी में

👉Hindi Kavita on life| Motivational Hindi Kavita

यहाँ पर हिंदी के सबसे ज्यादा मोटिवेशनल और इन्स्पिरिंग poem को जरूर पढ़ें।कुछ ऐसी कविताएँ जो हमारे मन को छू जाती है।

✍️Hindi Kavita on life| Hindi Kavita

👍 मकान चाहे कच्चे थे

लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे…💯

चारपाई पर बैठते थे

पास पास रहते थे…

सोफे और डबल बेड आ गए

दूरियां हमारी बढा गए….

छतों पर अब न सोते हैं

कहानी किस्से अब न होते हैं..

आंगन में वृक्ष थे

सांझा करते सुख दुख थे…

दरवाजा खुला रहता था

राही भी आ बैठता था…

कौवे भी कांवते थे

मेहमान आते जाते थे…

इक साइकिल ही पास थी

फिर भी मेल जोल की आस थी …

रिश्ते निभाते थे

रूठते मनाते थे…

पैसा चाहे कम था

माथे पे ना गम था…

मकान चाहे कच्चे थे

रिश्ते सारे सच्चे थे…

अब शायद कुछ पा लिया है

पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया है…

जीवन की भाग-दौड़ में –

क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?

😀😀हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है।

एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम

और आज कई बार

बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है!!😀😀

कितने दूर निकल गए,

रिश्तो को निभाते निभाते…

खुद को खो दिया हमने,

अपनों को पाते पाते…

मकान चाहे कच्चे थे…

रिश्ते सारे सच्चे थे…🙏🙏🙏


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👉 Ramdhari Singh Dinkar “प्रासादों के कनकाभ शिखर

“प्रासादों के कनकाभ शिखर,

होते कबूतरों के ही घर,

महलों में गरुड़ ना होता है,

कंचन पर कभी न सोता है.

रहता वह कहीं पहाड़ों में,

शैलों की फटी दरारों में.

होकर सुख-समृद्धि के अधीन,

मानव होता निज तप क्षीण,

सत्ता किरीट मणिमय आसन,

करते मनुष्य का तेज हरण.

नर वैभव हेतु लालचाता है,

पर वही मनुज को खाता है.

चाँदनी पुष्प-छाया मे पल,

नर भले बने सुमधुर कोमल,

पर अमृत क्लेश का पिए बिना,

आताप अंधड़ में जिए बिना,

वह पुरुष नही कहला सकता,

विघ्नों को नही हिला सकता.

उड़ते जो झंझावतों में,

पीते जो वारि प्रपातो में,

सारा आकाश अयन जिनका,

विषधर भुजंग भोजन जिनका,

वे ही फानिबंध छुड़ाते हैं,

धरती का हृदय जुड़ाते हैं.”


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👉 “सुख” तू कहाँ मिलता है …..

“सुख” तू कहाँ मिलता है

क्या तेरा कोई पक्का पता है

क्यों बन बैठा है अन्जाना

आखिर क्या है तेरा ठिकाना।

कहाँ कहाँ ढूंढा तुझको

पर तू न कहीं मिला मुझको

ढूंढा ऊँचे मकानों में

बड़ी बड़ी दुकानों में

स्वादिष्ट पकवानों में

चोटी के धनवानों में

वो भी तुझको ही ढूंढ रहे थे

बल्कि मुझको ही पूछ रहे थे

क्या आपको कुछ पता है

ये सुख आखिर कहाँ रहता है?

मेरे पास तो “दुःख” का पता था

जो सुबह शाम अक्सर मिलता था

परेशान होके शिकायत लिखवाई

पर ये कोशिश भी काम न आई

उम्र अब ढलान पे है

हौसला अब थकान पे है

हाँ उसकी तस्वीर है मेरे पास

अब भी बची हुई है आस

मैं भी हार नही मानूंगा

सुख के रहस्य को जानूंगा

बचपन में मिला करता था

मेरे साथ रहा करता था

पर जबसे मैं बड़ा हो गया

मेरा सुख मुझसे जुदा हो गया।

मैं फिर भी नही हुआ हताश|

जारी रखी उसकी तलाश

एक दिन जब आवाज ये आई

क्या मुझको ढूंढ रहा है भाई

मैं तेरे अन्दर छुपा हुआ हूँ

तेरे ही घर में बसा हुआ हूँ

मेरा नहीं है कुछ भी “मोल”

सिक्कों में मुझको न तोल

मैं बच्चों की मुस्कानों में हूँ

हारमोनियम की तानों में हूँ

पत्नी के साथ चाय पीने में

“परिवार” के संग जीने में

माँ बाप के आशीर्वाद में

रसोई घर के पकवानों में

बच्चों की सफलता में हूँ

माँ की निश्छल ममता में हूँ

हर पल तेरे संग रहता हूँ

और अक्सर तुझसे कहता हूँ

मैं तो हूँ बस एक “अहसास”

बंद कर दे तू मेरी तलाश

जो मिला उसी में कर “संतोष”

आज को जी ले कल की न सोच

कल के लिए आज को न खोना

मेरे लिए कभी दुखी न होना


✍️ Hindi Kavita on life | Hindi Kavita

👉 समय चला, पर कैसे चला…..

समय चला, पर कैसे चला,

पता ही नहीं चला ,

ज़िन्दगी की आपाधापी में ,

कब निकली उम्र हमारी यारो ,

पता ही नहीं चला ,

कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे ,

कब कंधे तक आ गए ,

पता ही नहीं चला ,

किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना ,

कब अपने घर तक आ गए ,

पता ही नहीं चला ,

साइकिल के पैडल मारते हुए                         

हांफते थे उस वक़्त,

कब से हम कारों में घूमने लगे हैं ,

पता ही नहीं चला ,

कभी थे जिम्मेदारी हम माँ बाप की ,

कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार हम ,

पता ही नहीं चला ,

एक दौर था जब दिन में भी

बेखबर सो जाते थे ,

कब रातों की उड़ गई नींद ,

पता ही नहीं चला ,

जिन काले घने बालों पर

इतराते थे कभी हम ,

कब सफेद होना शुरू हो गए

पता ही नहीं चला ,

दर दर भटके थे नौकरी की खातिर ,

कब रिटायर हो गए  समय  का ,

पता ही नहीं चला ,

बच्चों के लिए कमाने बचाने में   

इतने मशगूल हुए हम ,

कब बच्चे हमसे हुए दूर ,

पता ही नहीं चला ,

भरे पूरे परिवार से सीना चौड़ा रखते थे हम ,

अपने भाई बहनों पर गुमान था ,

उन सब का साथ छूट गया ,

कब परिवार हम दो पर सिमट गया ,

पता ही नहीं चला ,

अब सोच रहे थे  अपने

लिए भी कुछ करे ,

पर शरीर  ने साथ देना बंद कर दिया ,

पता ही नहीं चला


✍️Hindi Kavita| Hindi Kavita on life

👉वरदान माँगूँगा नहीं | शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

यह हार एक विराम है

जीवन महासंग्राम है

तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए

अपने खंडहरों के लिए

यह जान लो मैं विश्‍व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

क्‍या हार में क्‍या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं

संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

लघुता न अब मेरी छुओ

तुम हो महान बने रहो

अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

चाहे हृदय को ताप दो

चाहे मुझे अभिशाप दो

कुछ भी करो कर्तव्‍य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।


✍️ Hindi Kavita on life |Hindi Kavita

👉आहिस्ता चल ज़िंदगी!

आहिस्ता चल ज़िंदगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है !

कुछ दर्द मिटाना बाकी है , कुछ फ़र्ज़ निभाना बाकी है!

रफ़्तार में तेरे चलने से कुच्छ रूठ गये, कुछ च्छुत गये,

रूठों को मानना बाकी है, रोतों को हसाना बाकी है,

कुछ हसरातें अभी अधूरी हैं, कुछ काम भी और ज़रूरी है!

ख्वाहिशें जो घुट गयी इस दिल में, उनको दफ़नाना बाकी है!

कुछ रिश्ते बन कर टूट गये, कुछ जुड़ते – जुड़ते च्छुत गये!

उन टूटते – च्छुतते रिश्तों के ज़ख़्मों को मिटाना बाकी है!

तू आयेज चल मैं आता हूँ, क्या छ्चोड़ तुझे जी पौँगा ? 

इन साँसों पर हक़्क़ है जिनका, उनको समझाना बाकी है!

आहिस्ता चल ज़िंदगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है … 


✍️Hindi Kavita on life | Hindi Kavita

👉👉एक भी आँसू न कर बेकार

एक भी आँसू न कर बेकार –

जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है,

यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है,

और जिस के पास देने को न कुछ भी

एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है,

कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार

जाने देवता को कौनसा भा जाय!

चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण

किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं,

आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ –

पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं,

हर छलकते अश्रु को कर प्यार –

जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!

 व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की,

काम अपने पाँव ही आते सफर में,

वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा –

जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में,

हर लहर का कर प्रणय स्वीकार –

जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!

🙏🙏🙏🙏🙏

– रामावतार त्यागी


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👉👉खूनी हस्‍ताक्षर/गोपालप्रसाद व्यास

वह खून कहो किस मतलब का

जिसमें उबाल का नाम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का

आ सके देश के काम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का

जिसमें जीवन, न रवानी है!

जो परवश होकर बहता है,

वह खून नहीं, पानी है!

उस दिन लोगों ने सही-सही

खून की कीमत पहचानी थी।

जिस दिन सुभाष ने बर्मा में

मॉंगी उनसे कुरबानी थी।

बोले, “स्वतंत्रता की खातिर

बलिदान तुम्हें करना होगा।

तुम बहुत जी चुके जग में,

लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणें में जो,

जयमाल चढ़ाई जाएगी।

वह सुनो, तुम्हारे शीशों के

फूलों से गूँथी जाएगी।

आजादी का संग्राम कहीं

पैसे पर खेला जाता है?

यह शीश कटाने का सौदा

नंगे सर झेला जाता है”

यूँ कहते-कहते वक्ता की

आंखों में खून उतर आया!

मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा

दमकी उनकी रक्तिम काया!

आजानु-बाहु ऊँची करके,

वे बोले, “रक्त मुझे देना।

इसके बदले भारत की

आज़ादी तुम मुझसे लेना।”

हो गई सभा में उथल-पुथल,

सीने में दिल न समाते थे।

स्वर इनकलाब के नारों के

कोसों तक छाए जाते थे।

“हम देंगे-देंगे खून”

शब्द बस यही सुनाई देते थे।

रण में जाने को युवक खड़े

तैयार दिखाई देते थे।

बोले सुभाष, “इस तरह नहीं,

बातों से मतलब सरता है।

लो, यह कागज़, है कौन यहॉं

आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरनेवाले जन को

सर्वस्व-समर्पण काना है।

अपना तन-मन-धन-जन-जीवन

माता को अर्पण करना है।

पर यह साधारण पत्र नहीं,

आज़ादी का परवाना है।

इस पर तुमको अपने तन का

कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!

वह आगे आए जिसके तन में

खून भारतीय बहता हो।

वह आगे आए जो अपने को

हिंदुस्तानी कहता हो!

वह आगे आए, जो इस पर

खूनी हस्ताक्षर करता हो!

मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए

जो इसको हँसकर लेता हो!”

सारी जनता हुंकार उठी-

हम आते हैं, हम आते हैं!

माता के चरणों में यह लो,

हम अपना रक्त चढाते हैं!

साहस से बढ़े युबक उस दिन,

देखा, बढ़ते ही आते थे!

चाकू-छुरी कटारियों से,

वे अपना रक्त गिराते थे!

फिर उस रक्त की स्याही में,

वे अपनी कलम डुबाते थे!

आज़ादी के परवाने पर

हस्ताक्षर करते जाते थे!

उस दिन तारों ने देखा था

हिंदुस्तानी विश्वास नया।

जब लिक्खा महा रणवीरों ने

ख़ूँ से अपना इतिहास नया।

🙏🙏🙏🙏🙏


✍️ Hindi Kavita on life | Hindi Kavita

👉👉ज़िन्दगी को बहुत
सीरियसली लिया मैंने…

हर बात के अर्थ निकाले
हर ख़ामोशी समझी
हर आँख को पढ़ा मैंने…

अंत में जाना
जीवन सहज होने में है
यूँ ही जीने में है
जंग नही खेल है
कोई फर्क नही पड़ता हार जाने से
न फर्क पड़ता गिर पड़ने से
उठो कपड़े झाड़ो चल पड़ो…

न बोझ बनो किसी पर
न किसी को बोझ बनाओ
जितना मिले नाचो गाओ
कभी मन करे तो चुप हो जाओ
पर अब हर बात में अर्थ न ढूंढो..

🙏🙏🙏

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