सूरदास के पद अर्थ सहित।

सूरदास के पद | सूर के महान पद अर्थ,भाव सहित जाने

सूरदास जी की कृष्ण भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। सूरदास जी की अधिकतर रचनाएँ भक्ति पर आधारित हैं। सूरदास के पद में कवि ने बाल कृष्ण की अद्भुत लीलाओं का मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है।

सूरदास के पद में पदों के साथ उनका शब्दार्थ और भाव भी जानेगे

१ पद बिलावल 

चरन कमल बंदौ हरि राई ।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥

बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई ।

सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ॥१॥

शब्दार्थ

राई राजा। पंगु  लंगड़ा। लघै लांघ जाता है पार कर जाता है।

मूक गूंगा। रंक निर्धन गरीब कंगाल। छत्र धरा  राज-छत्र धारण करके।

तेहि  तिनके। पाई चरण।

सूरदास पद का भावार्थ

जिस पर श्रीहरि की कृपा हो जाती है उसके लिये असंभव भी सभव हो जाता है लूला-लंगड़ा मनुष्य पर्वत को भी लांघ जाता है। अंधे को गुप्त और प्रकट सबकुछ देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। बहरा सुनने लगता है। गूंगा बोलने लगता है कंगाल राज-छत्र धारण कर लेता हे। ऐसे करूणामय प्रभु की पद-वन्दना कौन अभागा न करेगा।

२ बिलावल 

अबिगत गति कछु कहति न आवै।

ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥

परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।

मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥

रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।

सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥२॥

शब्दार्थ

अबिगत  अव्यक्त अज्ञेय जो जाना न जा सके।

गति  बात। अन्तर्गत  हृदय अन्तरात्मा। 

भावै  रुचिकर प्रतीत होता है।

अमित अपार। तोष सन्तोष आनन्द। अगोचर  इन्द्रियजन्य ज्ञान से परे।

गुन गुण सत्व रज और तमो गुण से आशय है। निरालंब  बिना अवलंब या सहारे के।

सगुन सगुण दिव्यगुण संयुक्त साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण।

सूरदास पद का भावार्थ

यहां अव्यक्तोपासना को देहाभिमानियों के लि क्लिष्ट बताया है। निराकार निर्गुण ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है।

वह मन और वाणी का विषय नहीं गूंगे को मिठा खिला दी जाय और उससे उसका स्वाद पूछा जाय तो वह कैसे बतला सकता है वह रसानंद तो उसका अन्तर ही जानता है।

अव्यक्त ब्रह्म का न रूप है न रेख न गुण है न जाति। मन वहां स्थिर ही नहीं हो सकता। सब प्रकार से वह अगम्य है अतः सूरदास सगुण ब्रह्म श्रीकृष्ण की लीलां का ही गायन करना ठीक समझते हैं।

३ धनाश्री 

प्रभु मेरे औगुन न विचारौ।

धरि जिय लाज सरन आये की रबि-सुत-त्रास निबारौ॥

जो गिरिपति मसि धोरि उदधि में लै सुरतरू निज हाथ।

ममकृत दोष लिखे बसुधा भरि त नहीं मिति नाथ॥

कपटी कुटिल कुचालि कुदरसन अपराधी मतिहीन।

तुमहिं समान और नहिं दूजो जाहिं भजौं ह्वै दीन॥

जोग जग्य जप तप नहिं कीण।ह्हौं बेद बिमल नहिं भाख।ह्यौं।

अति रस लुब्ध स्वान जूठनि ज्यों अनतै ही मन राख्यौ॥

जिहिं जिहिं जोनि फिरौं संकट बस तिहिं तिहिं यहै कमायो।

काम क्रोध मद लोभ ग्रसित है विषै परम विष खायो॥

अखिल अनंत दयालु दयानिधि अघमोचन सुखरासि।

भजन प्रताप नाहिंने जान।ह्यौं बंध्यौ काल की फांसि॥

तुम सर्वग्य सबै बिधि समरथ असरन सरन मुरारि।

मोह समुद्र सूर बूड़त है लीजै भुजा पसारि॥३॥

शब्दार्थ

औगुन अवगुण दोष। सरन आ की  शरण में आने की।

रविसुत  सूर्य पुत्र यमराज। त्रास  भय। निवारो दूर कर दो। मसि स्याही।

सुरतरु कल्पवृक्ष यहां कल्पवृक्ष का लेखनी से आशय है। मिति अन्त। 

परम बिष तेज जहर। अखिल सर्वरूप। अघमोचन  पापों से छुड़ानेवाला।

मोह  अज्ञान संसार से तात्पर्य है। पसारि  बढ़ाकर।

सूरदास पद का भावार्थ

जीव के अपराधों का अन्त नहीं। अपराधों की तरफ देखकर यदि न्याय किया गया 

तब तो उद्धार पाने की को आशा नहीं। शरणागत को भगवान तार देते हैं इस न्याय पर 

ही सूर का उद्धार भाव सागर से होना चाहि।

४ सारंग 

प्रभु हौं सब पतितन कौ राजा।

परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग यह निसान नित बाजा॥

तृस्ना देसरु सुभट मनोरथ इंद्रिय खड्ग हमारे।

मंत्री काम कुमत दैबे कों क्रोध रहत प्रतिहारे॥

गज अहंकार चढ्यौ दिगविजयी लोभ छ।ह्त्र धरि सीस॥

फौज असत संगति की मेरी ऐसो हौं मैं ईस।

मोह मदै बंदी गुन गावत  मागध दोष अपार॥

सूर पाप कौ गढ दृढ़ कीने मुहकम लाय किंवार॥४॥

शब्दार्थ

पूरि रह्यौ भर रहा है। निसान  नगाड़ा। रु अरु और।

सुभट योद्धा। कुमंत  कुमंत्र बुरी सलाह। प्रतिहार  द्वारपाल। असत झूठदुष्ट

ईस राजा। मदै  मद ही। मागध मगध देश के भाट जो वंश विरुदावली बखानते हैं।

गढ़ किला। मुहकम  मजबूत। किंवार  किवाड़ फाटक।

सूरदास पद का भावार्थ

यहां बड़े पापी की राजा से तुलना की ग है। परनिन्दा ही राजमहल के द्वार पर

नौबत का बजना है। तृष्णा पतितेश का देश है। अनेक मनोरथ योद्धा हैं। इन्द्रियां

तलवार का काम देती हैं।काम कुमंत्री है और क्रोध है द्वारपाल। अहंकार दिग्विजय 

कराने में साथी है। सिर पर लोभ का राज छत्र है। दुष्टों की संगति सेना है।

ऐसे नरेश की विरुदावली का गान मोह मदादि कर रहे हैं।

भक्तिवाद में दीनता ही दीनबंधु की शरण में ले जाती है।

५ बिलावल 

अब कै माधव मोहिं उधारि।

मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि॥

नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग।

लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥

मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ सिर भार।

पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार॥

काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति झकझोर।

नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥

थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल।

स्याम भुज गहि काढ़ि डारहु सूर ब्रज के कूल॥५॥

शब्दार्थ

अब कैं अबकी बार इस जन्म में। उधारि  उद्धार करो।

मगन मग्न डूबा हुआ। 

भाव  संसार। अंबुनिधि समुद्र। ग्राह मगर।

अनंग  काम वासना। मोट गठरी। सिवार  शैवाल पानी के अन्दर उगनेवाली घास 

जिसमें मनुष्य प्रायः फंस जाता है। कूल किनारा।

सूरदास के पद का भावार्थ

संसार-सागर में माया अगाध जल है  लोभ की लहरें हैं काम वासना का मगर है 

इन्द्रियां मछलियां हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हु है।इस समुद्र 

में मोह सवार है। काम-क्रोधादि की वायु झकझोर रही है। तब एक हरि नाम की नौका ही

पार लगा सकती है पर-स्त्री तथा पुत्र का माया-मोह उधर देखने ही नहीं देता। भगवान

ही हाथ पकड़कर पार लगा सकते हैं।

६ देवगंधार

मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी।

ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥

पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी।

मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥

एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी।

भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥

मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी।

स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥

सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी।

अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी॥६॥

शब्दार्थ

होड़  बाजी। नागर  चतुर। जक हठ। दरी कन्दरागुफा।

दुर गयो  छिप गया। अपनी धरनी  अपनी शक्ति भर। जकनि करी हठ किया।

निनुरी  निर्णय हो जागा।

सूरदास के पद का भावार्थ

तुम सों होड़ परी तुम्हारा नाम पतितोद्धारक है पर मुझे इसका विश्वास 

नहीं। आज जांचने आया हूं कि तुम कहां तक पतितों का उद्धार करते हो। तुमने 

उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह ठान रखा है।

इस बाजी में देखना है कौन जीतता है।

मैं तो राजिव॥॥दरी तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों की दृष्टि बचाकर मैं पाप-पहाड़ 

की गुफा में छिपकर बैठ गया हूं।

७ धनाश्री 

अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल।

काम क्रोध कौ पहिरि चोलना कंठ विषय की माल॥

महामोह के नूपुर बाजत निन्दा सब्द रसाल।

भरम भर।ह्‌यौ मन भयौ पखावज चलत कुसंगति चाल॥

तृसना नाद करति घट अन्तर नानाविध दै ताल।

माया कौ कटि फैंटा बांध्यो लोभ तिलक दियो भाल॥

कोटिक कला काछि दिखरा जल थल सुधि नहिं काल।

सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नंदलाल॥७॥

शब्दार्थ

चोलना  नाचने के समय का घेरदार पहनावा।

पखावज मृदंग। विषय  कुवासना। फैंटा कमरबंद। अविद्या अज्ञान।

सूरदास के पद का भावार्थ

संसार के प्रवृति मार्ग पर भटकते-भटकते जीव अन्त में प्रभु से कहता है 

तुम्हारी आज्ञा से बहुत नाच मैंने नाच लिया। अब इस प्रवृति से मुझे छुटकारा दे दो 

मेरा सारा अज्ञान दूर कर दो।

वह नृत्य कैसा काम-क्रोध के वस्त्र पहने। विषय की माला पहनी। अज्ञान के घुंघरू 

बजे। परनिन्दा का मधुर गान गाया। भ्रमभरे मन ने मृदंग का काम दिया। तृष्णा ने 

स्वर भरा और ताल तद्रुप दिये। माया का फेंटा कस लिया था। माथे पर लोभ का तिलक 

लगा लिया था। तुम्हें रिझाने के लि न जाने कितने स्वांग रचे। कहां-कहां नाचना 

पड़ा किस-किस योनि में चक्कर लगाना पड़ा। न तो स्थान का स्मरण है न समय 

का। किसी तरह अब तो रीझ जा नंदनंदन।

८ बिलावल 

कब तुम मोसो पतित उधारो।

पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥

बड़े पतित पासंगहु नाहीं अजमिल कौन बिचारो।

भाजै नरक नाम सुनि मेरो जमनि दियो हठि तारो॥

छुद्र पतित तुम तारि रमापति जिय जु करौ जनि गारो।

सूर पतित कों ठौर कहूं नहिं है हरि नाम सहारो॥८॥

शब्दार्थ

मोसो मेरे समान। पावन पवित्र करने वाला। पासंगहुं पासंग भी।

अजमिल  भक्त अजामिल जो लड़के का नारायण नाम लेने से यम पाश से मुक्त हो 

गया था। बिचारो  बेचारा। भाजै भागता है। जमनि यमदूतों ने। हठी जबरदस्ती से।

तारो ताला। गारो बड़ा अभिमान। ठौर जगह।

सूरदास के पद का भावार्थ

जो पुण्य करता है वह स्वर्ग पद पाता है। मैंने को पुण्य नहीं किया इससे 

स्वर्ग जाने का तो मेरा अधिकार है नहीं। अब रह गया नरक। मगर नरक भी मेरे महान 

पापों को देखकर डर गया है। वहां भी प्रवेश नहीं। अब कहां जां। अब तो नाथ 

तुम्हारे चरणों का ही अवलम्ब है सो वहीं थोड़ी-सी जगह कृपाकर दे दो।

९ धनाश्री 

अपन जान मैं बहुत करी।

कौन भांति हरि कृपा तुम्हारी सो स्वामी समुझी न परी॥

दूरि गयौ दरसन के तां व्यापक प्रभुता सब बिसरी।

मनसा बाचा कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी॥

गुन बिनु गुनी सुरूप रूप बिनु नाम बिना श्री स्याम हरी।

कृपासिंधु अपराध अपरिमित छमौ सूर तैं सब बिगरी॥९॥

शब्दार्थ

तां लि। प्रभुता  ईश्वरता। मनसा  मनसे। वाचा वाणी से।

अगोचर  इन्द्रियजन्य ज्ञान से परे। धरी धारणा की। छमौ  क्षमा करो।

भावार्थ सूरदास के पद का

जीव मानता है कि अपनी शक्ति पर प्रभु प्राप्ति की उसने अनेक साधनां की पर

अन्त में यह उसकी भ्रांत धारणा ही निकली। प्रभु तो सर्वत्र व्यापक है पर यह कहां-

कहां उसके दर्शन को भटकता फिरा। समझ में न आया कि वह निर्गुण होते हु भी सगुण है 

निराकार होते हु भी साकार है। अज्ञान में तो अपराध हु ही ज्ञानाभिमान के द्वारा 

भी कम अपराध नहीं हु। सो अब तो बिगड़ी हु बात क्षमा मांगने से ही बनेगी।

१० सारंग 

आछो गात अकारथ गार।ह्‌यो।

करी न प्रीति कमललोचन सों जनम जनम ज्यों हार।ह्‌यो॥

निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गं तु चार।ह्‌यो।

अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन द कौ मार।ह्‌यो॥

कामी कृपन कुचील कुदरसन को न कृपा करि तार।ह्‌यो।

तातें कहत दयालु देव पुनि काहै सूर बिसार।ह्‌यो॥१०॥

शब्दार्थ

आछो  अच्छा सुन्दर। गात शरीर। अकारथ  व्यर्थ। गार।ह्‌यो बरबाद कर 

दिया। ज्यो जीव। तु तेरी। चार।ह्‌यो  चारों नेत्र दो बाहर के नेत्र और दो 

भीतर के ज्ञान नेत्र। द दुर्दैव दुर्भाग्य। कृपन लोभी घृणित। कुचील मैला 

गंदा। कुदरसन  कुरूप।

भावार्थ सूरदास के पद का

जनम॥॥हार।ह्‌यो  प्रत्येक जन्म में व्यर्थ ही सुन्दर शरीर नष्ट कर दिया।

नर शरीर पाकर भी हरि का भजन करते न बना। जिस शरीर को मोक्ष का द्वार कहा है

उसे भी विषय-भोगों में नष्ट कर दिया। पर भक्त को प्रभु की कृपा का अब भी भरोसा

है। हरि की कृपा ने बड़े-बड़े कामी कृपण मलिन और कुरूपों को 

भाव-सागर से तार दिया। लेकिन सूर को तो इस नियम में भी अपवाद प्रतीत होता है। न जाने उस दयालु ने 

सूर को क्यों बिसरा दिया 

११ कान्हरा 

सो रसना जो हरिगुन गावै।

नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै॥

निर्मल चित तौ सो सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।

स्रवननि की जु यहै अधिका सुनि हरि कथा सुधारस प्यावै॥

कर तै जै स्यामहिं सेवैं चरननि चलि बृन्दावन जावै।

सूरदास जै यै बलि ताको जो हरिजू सों प्रीति बढ़ावै॥११॥

शब्दार्थ

रसना जीभ वाणी। छवि शोभा। मकरंद पराग। न 

भावै  अच्छा नहीं लगता

है। अधिका  बड़ा सार्थकता।

भावार्थ सूरदास के पद का

हरि-परायण होने में ही हरेक इंद्रिय की सार्थकता है यही इस पद का सार है 

नैननि की॥॥।धावे  नेत्रों को अप्रकट रूप से यहां भ्रमर बनाया गया है। उसी नैन

रूपी मधुकर के सफल जीवन हैं जो मुकुंदरूपी मकरंद अर्थात कृष्ण-छवि पराग का पान 

करने के लि दौड़ते हैं।

१२ सारंग 

माधवजू जो जन तैं बिगरै।

तौ कृपाल करुनामय केसव प्रभु नहिं जीय धर॥

जैसें जननि जठर अन्तरगत सुत अपराध करै।

तो जतन करै अरु पोषे निकसैं अंक भरै॥

जद्यपि मलय बृच्छ जड़ काटै कर कुठार पकरै।

त सुभाव सुगंध सुशीतल रिपु तन ताप हरै॥

धर विधंसि नल करत किरसि हल बारि बांज बिधरै।

सहि सनमुख तौ सीत उष्ण कों सो सफल करै॥

रसना द्विज दलि दुखित होति बहु तौ रिस कहा करै।

छमि सब लोभ जु छांड़ि छवौ रस लै समीप संचरै॥

करुना करन दयाल दयानिधि निज भय दीन डर।

इहिं कलिकाल व्याल मुख ग्रासित सूर सरन उबरे॥१२॥

शब्दार्थ

त तो भी। नहिं जीय धरै मन में नहीं लाते। जठर अन्तर्गत  पेट के 

भीतर गर्भ में। अंक गोद। रिपु शत्र काटने से तात्पर्य है। धर धरा पृथ्वी। 

नल नाला। करषि जोत कर। द्विज दांत। 

भावार्थ सूरदास के पद का

जीव के प्रति भगवान की असीम करुणाशीलता है। कितना ही को अपराध करे

करुणामय हरि उसे क्षमा ही करते हैं। बच्चा कितने ही अपराध करे माता तो उसे छाती 

से लगा कर प्यार ही करेगी। मलयागिर कुठाराघात करने वाले के शरीर को भी शीतलता देगा।

धरती को हल से जोतते हैं उसे विदीर्ण करते हैं फिर भी वह दुःखों को झेलकर सुन्दर 

फल देती है। जीभ की भी यही बात है। सदा दांतों तले दबी रहती है पर कभी दांतों पर 

क्रोध नहीं करती। छहों रसों का स्वाद उनको चखाती है। ऐसे ही ईश्वर अपनों के 

अज्ञानावस्था में किये अपराधों को क्षमा कर देता है।

१३ कान्हरा 

कीजै प्रभु अपने बिरद की लाज।

महापतित कबहूं नहिं आयौ नैकु तिहारे काज॥

माया सबल धाम धन बनिता बांध्यौ हौं इहिं साज।

देखत सुनत सबै जानत हौं त न आयौं बाज॥

कहियत पतित बहुत तुम तारे स्रवननि सुनी आवाज।

द न जाति खेवट उतरा चाहत चढ्यौ जहाज॥

लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज।

न न करन कहत प्रभु तुम हौ सदा गरीब निवाज॥१३॥

शब्दार्थ

बिरद बड़ा। न आयौं बाज  छोड़ा नहीं। खेवट  नाव खेने वाला।

उतरा पार उतारने की मजदूरी। न  को न बात।

भावार्थ सूरदास के पद का

इस पद में भक्त ने भगवान के आगे अपना हृदय खोलकर रख दिया है।

कहता है तुम्हें अपने विरद की लाज रखनी हो तो तार ही दो। पूछो तो मैं आज तक 

तुम्हारे काम नहीं आया। इस प्रबल माया अकोन कामिनी-कांचन के बंधन में बहुत बुरी 

तरह से जकड़ा हूं। देखता हूं सुनता हूं और सब जानता हूं पर जो नहीं करना चाहि 

वही करता चला जाता हूं। पर यह विश्वास है कि तुम पतितोद्धारक हो। यद्दपि मैं पार 

उतरा नहीं देना चाहता हूं फिर भी नाव पर चढ़ना चाहता हूं। तुमसे को न बात करने 

को नहीं कहता। तुम तो सदा से पतितों को पार उतारते आये हो। तुम गरीब-निवाज हो तो

मुझ गरीब को भी पार लगा दो।

नेकु तिहारे काज त न आयौं बाज द न जाति॥॥जहाज न न करन कहत

आदि की बड़ी सुन्दर और मुहावरे-दार भाषा है।

अहंकार को भगवान की अगाध करुणा में डुबो देने की ओर इस पद में संकेत किया गया है।

१४ रामकली 

सरन गये को को न उबार।ह्‌यो।

जब जब भीर परीं संतति पै चक्र सुदरसन तहां संभार।ह्‌यौ।

महाप्रसाद भयौ अंबरीष कों दुरवासा को क्रोध निवार।ह्‌यो॥

ग्वालिन हैत धर।ह्‌यौ गोवर्धन प्रगट इन्द्र कौ गर्व प्रहार।ह्‌यौ॥

कृपा करी प्रहलाद भक्त पै खम्भ फारि हिरनाकुस मार।ह्‌यौ।

नरहरि रूप धर।ह्‌यौ करुनाकर छिनक माहिं उर नखनि बिदार।ह्‌यौ।

ग्राह-ग्रसित गज कों जल बूड़त नाम लेत वाकौ दुख टार।ह्‌यौ॥

सूर स्याम बिनु और करै को रंगभूमि में कंस पछार।ह्‌यौ॥१४॥

शब्दार्थ

उबार।ह्‌यौ रक्षा की। भीर संकट। संभार।ह्‌यौ  हाथ में लिया।

अंबरीष  एक हरि भक्त राजा। दुरवासा  दुर्वासा नामके एक महान क्रोधी ऋषि।

प्रहार।ह्‌यौ नष्ट किया। नरहरि  नृसिंह। नखनि नाखूनों से। बिदार।ह्‌यौ चीर फाड़ 

डाला। रंगभूमि  सभा स्थल।

भावार्थ सूरदास के पद का

जो भी भगवान की शरण में गया उसने अभय पद पाया। यद्यपि भगवान् का न को मित्र 

है न को शत्रु तो भी सत्य और असत्य की मर्यादा की रक्षा के लि अजन्मा होते हु 

भी वह रक्षक और भक्षक के रूप धारण करते हैं। प्रतिज्ञा भी यही है।

१५ नट 

जौलौ सत्य स्वरूप न सूझत।

तौलौ मनु मनि कंठ बिसारैं फिरतु सकल बन बूझत॥

अपनो ही मुख मलिन मंदमति देखत दरपन माहीं।

ता कालिमा मेटिबै कारन पचतु पखारतु छाहिं॥

तेल तूल पावक पुट भरि धरि बनै न दिया प्रकासत।

कहत बनाय दीप की बातैं कैसे कैं तम नासत॥

सूरदास जब यह मति आ वै दिन गये अलेखे।

कह जानै दिनकर की महिमा अंध नयन बिनु देखे॥१५॥

शब्दार्थ

बूझत फिरतु पूछता फिरता है। पचतु परेशान होता है। पखारतु  धोता 

है साफ करता है। तूल रु। पुट  दीपक से तात्पर्य है। अलख वृथा।

सूरदास के पद का भावार्थ

सत्य स्वरूप अपनी आत्मा का वास्तविक रूप। असत् शरीर को ही अविद्यावश

आत्मा मान लिया गया है। वह तो सनातन सत्य है।

तौलों॥॥।बूझत मणि-माला गले में ही पहने है  पर भ्रमवश इधर-उधर खोजता फिरता 

है। आत्मा तो अन्तर में ही है पर उसे हम जगह-जगह खोजते फिरते हैं।

अपनी॥ॅह्हाहिं मुंह में तो अपना काला है पर वह मूर्ख शीशे में कालिमा समझ रहा 

है  उस शीशे को बार-बार साफ कर रहा है। असद।ह्ज्ञान के साधन भी असत् ही होते हैं।

जब तक जीवात्मा को स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ उसे सत् असत् का विवेक 

प्राप्त नहीं हो सकता।

१६ लारंग 

तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान।

छूटि गये कैसे जन जीवै ज।ह्यौं प्रानी बिनु प्रान॥

जैसे नाद-मगन बन सारंग बधै बधिक तनु बान।

ज।ह्यौं चितवै ससि ओर चकोरी देखत हीं सुख मान॥

जैसे कमल होत परिफुल्लत देखत प्रियतम भान।

दूरदास प्रभु हरिगुन त्योंही सुनियत नितप्रति कान॥१६॥

शब्दार्थ

जन दास। नाद शब्द राग। सारंग मृग। भान भानुसूर्य।

सूरदास के पद का भावार्थ

यह अनन्यता का वर्णन है। यह तन्मयता से प्राप्त होती है। बिना प्राण

के जैसे प्राणी शब्द निरर्थक है वैसे ही भगवद्भक्ति-रहित जीवन व्यर्थ है।

मृग का राग-प्रेम चकोर का चन्द्र-प्रेम और कमल का सूर्य प्रेम प्रसिद्ध है। जीव 

को इसी प्रकार भगवत्प्रेम में तन्मय हो जाना चाहि।

१७ कल्याण 

धोखैं ही धोखैं डहकायौ।

समुझी न परी विषय रस गीध्यौ हरि हीरा घर मांझ गंवायौं॥

क।ह्यौं कुरंग जल देखि अवनि कौ प्यास न ग दसौं दिसि धायौ।

जनम-जनम बहु करम किये हैं तिन में आपुन आपु बंधायौ॥

ज।ह्यौं सुक सैमर -फल आसा लगि निसिबासर हठि चित्त लगायौ।

रीतो पर।ह्‌यौ जबै फल चाख्यौ उड़ि गयो तूल तांबरो आयौ॥

ज।ह्यौं कपि डोरि बांधि बाजीगर कन-कन कों चौहटें नचायौ।

सूरदास भगवंत भजन बिनु काल ब्याल पै आपु खवायौ॥१७॥

शब्दार्थ

डहकायौ ठगा गया। गीध्यौ  लालच में पड़ गया। कुरंग  मृग।

जल देखि अवनि कौ  ग्रीष्म में धरती से उठती हु गर्म हवा को जल समझ लिया यही 

मृगतृष्णा है। सेमर शाल्मलि वृक्ष। तूल रू। तांवरो मूर्छा।चौंहटे चौहटाचौक।

सूरदास के पद का भावार्थ

क्षणिक विषय-रसों में आनंद मानकर यह जीव आत्मानन्द से विमुख रह 

गया। धोखे में ठगाया गया। हरि-हीरा को अंतर में खोकर जीवनभर विषय-रस

में भूला रहा। कालरूपी सर्प खा गया।

ज्यों सुक॥।आयौ। तोता सेमर के फल में रात-दिन आशा लगाये बैठा रहा कि कब पकता 

है। अंत में पका जानकर चोंच मारी तो अंदर से केवल रु निकली। इससे किसकी 

भूख बुझी है विषय-सुखों का परिणाम सारहीन ही है।

अंत में जब काल-ब्याल के मुख में पड़ गया तब पछताने से क्या होगा 

१८ नट 

कहावत ऐसे दानी दानि।

चारि पदारथ दिये सुदामहिं अरु गुरु को सुत आनि॥

रावन के दस मस्तक छेद सर हति सारंगपानि।

लंका राज बिभीषन दीनों पूरबली पहिचानि।

मित्र सुदामा कियो अचानक प्रीति पुरातन जानि।

सूरदास सों कहा निठुर नैननि हूं की हानि॥१८॥

शब्दार्थ

छेदे काट डाले। सारंगपानि  धनुर्धारी राम। पूरबली  पुरानी 

पहले की। निठुरा निर्दयता निठुरां।

सूरदास के पद का भावार्थ

कहावत॥।दानि ऐसे दानी आजदानी के नाम से प्रसिद्ध हैं राम और 

कृष्ण को लोग बड़ा दानी कहते हैं। पर उन्होंने को निःस्वार्थ दान तो दिया नहीं। 

अकारण दान करते तो दानी अवश्य कहे जाते। फिर भी वे आज दानी के नाम से पुकारे

जाते हैं।

चारि॥।सुदामहिं सुदामा और श्रीकृष्ण उज्जैन में गुरु सांदीपन के गुरुकुल में 

पढ़ते थे। सुदामा ने वहां कभी कृष्ण को को कष्ट नहीं होने दिया। यदि द्वारिकाधीश

ने तब उसे माला-माल कर दिया होता तो कौन-सी बड़ी बात थी। प्रत्युपकार ही

होना था। विभीषण ने घर के सारे भेद राम को बतला दिये थे उन्होंने उसे लंका का 

राज्य सौंप दिया। फिर भी राम और कृष्ण आदर्श दानी कहे जाते हैं। कुछ हो सूर के 

साथ तो निठुरा का ही व्यवहार किया नेत्रों से भी हीन कर दिया।

१९ देवगंधार 

मेरो मन अनत कहां सचु पावै।

जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥

कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै।

परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥

जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ क्यों करील-फल खावै।

सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥१९॥

शब्दार्थ

अनत अन्यत्र। सचु सुख शान्ति। कमलनैन  श्रीकृष्ण। दुर्मति मूर्ख

खनावै  खोदता है। करील -फल  टेंट। छेरी बकरी।

सूरदास के पद का भावार्थ

यहां भक्त की भगवान् के प्रति अनन्यता की ऊंची अवस्था दिखा ग है।

जीवात्मा परमात्मा की अंश-स्वरूपा है। उसका विश्रान्ति-स्थल परमात्माही है  

अन्यत्र उसे सच्ची सुख-शान्ति मिलने की नहीं।

प्रभु को छोड़कर जो इधर-उधर सुख खोजता है वह मूढ़ है। कमल-रसास्वादी

भ्रमर भला करील का कड़वा फल चखेगा कामधेनु छोड़कर बकरी को कौन मूर्ख दुहेगा 

२० नट 

प्रभु मेरे औगुन चित न धरौ।

समदरसी प्रभु नाम तिहारो अपने पनहिं करौ॥

इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परौ।

यह दुबिधा पारस नहिं जानत कंचन करत खरौ॥

इक नदिया इक नार कहावत मैलो नीर भरौ।

जब मिलिकैं दो एक बरन भये सुरसरि नाम परौ॥

एक जीव इक ब्रह्म कहावत सूरस्याम झगरौ।

अब की बेर मोहिं पार उतारौ नहिं पन जात टरौ॥२०॥

शब्दार्थ

औगुन  अवगुण दोष। चित्त न धरौ  मन में न ला।

पन प्रण प्रतिज्ञा। दुबिधा भेद-

सूरदास के पद का भावार्थ

। पारस एक पत्थर जिसके स्पर्श से

कहते हैं लोहा सोना हो जाता है। खरौ  चोखा। असली। नारनाला।

सुरसरि गंगा।

टिप्पणी 

भगवान् समदर्शी हैं। ब्राह्मण और चांडाल को वह एक दृष्टि से देखते 

हैं। जीव अपनी स्वयं की शक्ति से कुछ नहीं कर सकता पुरुषार्थ तो परमात्मा का 

ही है। यदि वह जीव के अपराधों पर ध्यान देगा तब तो न्याय हो चुका  तब उसकी

समदर्शिता कहां रह जायेगी।

२१ केदारा 

है हरि नाम कौ आधार।

और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥

नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।

सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौ घृत-सार॥

दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।

सूर हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भाव-भार॥२१॥

शब्दार्थ

आधार  भरोसा। बिधि वेदोक्त कर्म-कांड से आशय है। ब्यौहार क्रिया 

साधन। सुक शुकदेव। इतौ इतना ही। गुन गुण-सत्व रज और तमोगुण। जार जाल।

सूरदास के पद का भावार्थ

भार जन्म मरण के चक्र से अभिप्राय है।

टिप्पणी 

हरि-भजन ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट और तत्काल फलदायक साधन है।

इसलि सब तज हरि भज ही मुख्य है।

२२ सारंग 

रे मन राम सों करि हेत।

हरिभजन की बारि करिलै उबरै तेरो खेत॥

मन सुवा तन पींजरा तिहि मांझ राखौ चेत।

काल फिरत बिलार तनु धरि अब धरी तिहिं लेत॥

सकल विषय-विकार तजि तू उतरि सागर-सेत।

सूर भजु गोविन्द-गुन तू गुर बताये देत॥२२॥

शब्दार्थ

हेत प्रेम। वारि  कांटों का घेरा जो पशुं से बचाने के लि खेत के

चारों तरफ लगा दिया जाता है। उबरे तेरो खेत  तेरे जीवन-क्षेत्र की रक्षा हो जाय 

चेत होशियार हो। सेत सेतु पुल।

टिप्पणी 

यह जीवन क्षेत्र है पर क्षणस्थायी है। इसकी यदि रखवाली करनी है इसे

सार्थक बनाना है तो भगवान् का भजन किया कर। काल से मुक्ति पाने का हरि-भजन ही 

अमोघ उपाय है। काल किसी का लिहाज नहीं करता। विषयों से मोह हटाकर गोविन्द का गुण-

गान करने से ही तू संसार-सागर पार कर सकेगा अन्यथा नहीं।

२३ सारंग 

मो सम कौन कुटिल खल कामी।

जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ ऐसौ नोनहरामी॥

भरि भरि उदर विषय कों धावौं जैसे सूकर ग्रामी।

हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥

पापी कौन बड़ो है मोतें सब पतितन में नामी।

सूर पतित कों ठौर कहां है सुनि श्रीपति स्वामी॥२३॥

शब्दार्थ

कुटिल  कपटी। विषय  सांसारिक वासनां। 

ग्रामी सूकर गांव का सूर। श्रीपति  श्रीकृष्ण से आशय है।

२४ सारंग 

जापर दीनानाथ ढरै।

सो कुलीन बड़ो सुन्दर सी जिहिं पर कृपा करै॥

राजा कौन बड़ो रावन तें गर्वहिं गर्व गरै।

कौन विभीषन रंक निसाचर हरि हंसि छत्र धरै॥

रंकव कौन सुदामाहू तें आपु समान करै।

अधम कौन है अजामील तें जम तहं जात डरै॥

कौन बिरक्त अधिक नारद तें निसि दिन भ्रमत फिरै।

अधिक कुरूप कौन कुबिजा तें हरि पति पा तरै॥

अधिक सुरूप कौन सीता तें जनम वियोग भरै।

जोगी कौन बड़ो संकर तें ताकों काम छरै॥

यह गति मति जानै नहिं को किहिं रस रसिक ढरै।

सूरदास भगवन्त भजन बिनु फिरि-फिरि जठर जरै॥२४॥

शब्दार्थ

ढरे प्रसन्न हो जाय। गर्व हि गर्व गरै  अहंकार ही अहंकार में गल

कर नष्ट हो जाता है। छत्र  राजछत्र। छरे  छलता है। किहिं रस रसिक ढरै

किस साधन से भगवान् रीझ जाते हैं। जठर जरै  गर् भाव स का दुःख भोगता रहेगा।

टिप्पणी 

भगवान् की लीला के अन्दर क्या-क्या रहस्य भरे पड़े हैं को समझ नहीं 

सकता। को एक सिद्धान्त देखने में नहीं आता। बड़े बड़े उच्चकुलीनों का पतन हो गया 

और नीच कहे जानेवाले पार हो गये। विभीषन को लंका का राज्य दे दिया और रावण

का गर्व धूल में मिला दिया। भिखारी सुदामा को द्वारकाधीश कृष्ण ने अपनी बराबरी का 

बना लिया योगिराज नारद दर-दर घूमते फिरे। कुरूपा कुब्जा कृष्णको पसन्द आ ग 

जबकि सीता को जीवनभर वियोग भोगना पड़ा।शंकर जैसे महान् योगी को कामदेव ने छलना 

चाहा। ये सब विपरीत बातें हुं। भगवान् के प्रसन्न होने का कहां सिद्धान्त स्थिर 

किया जाय 

२५ बिलावल 

मन तोसों कोटिक बार कहीं।

समुझि न चरन गहे गोविन्द के उर अघ-सूल सही॥

सुमिरन ध्यान कथा हरिजू की यह एकौ न रही।

लोभी लंपट विषयनि सों हित यौं तेरी निबही॥

छांड़ि कनक मनि रत्न अमोलक कांच की किरच गही।

ऐसो तू है चतुर बिबेकी पय तजि पियत महीं॥

ब्रह्मादिक रुद्रादिक रबिससि देखे सुर सबहीं।

सूरदास भगवन्त-भजन बिनु सुख तिहुं लोक नहीं॥२५॥

शब्दार्थ

अघसूल सही  पाप-कर्म जनित यातना सहता रहा।

यह एकौ न रही  एक भी बात पसन्द न आ। हित  प्रेम। किरच  टुकड़ा।

मही छाछ।

टिप्पणी 

बहुत समझाने पर भी यह मन वास्तविक तत्व को समझा ही नहीं। विषय-सुखों 

से ही मित्रता जोड़ी। उन जैसों के साथ ही इसकी बनी। भगवद्-भजन न किया न किया।

कांचन और रत्न को छोड़कर अभागे ने कांच के टुकड़े पसन्द किये। दूध फेंककर मट्ठा 

पिया सारांश यह कि विषयों में स्थायी आनन्द नहीं। वह तो विवेकपूर्वक किये हु हरि

भजन में ही है।

२६ बिहाग 

भजु मन चरन संकट-हरन।

सनक संकर ध्यान लावत सहज असरन-सरन॥

सेस सारद कहैं नारद संत-चिन्तन चरन।

पद-पराग-प्रताप दुर्लभ रमा के हित-करन॥

परसि गंगा भ पावन तिहूं पुर-उद्धरन।

चित्त चेतन करत अन्तसकरन-तारन-तरन॥

गये तरि ले नाम कैसे संत हरिपुर-धरन।

प्रगट महिमा कहत बनति न गोपि-डर-आभरन॥

जासु सुचि मकरंद पीवत मिटति जिय की जरन।

सूर प्रभु चरनारबिन्द तें नसै जन्म रु मरन॥२६॥

शब्दार्थ

सनक  सनक सनन्दन सनातन और सनत्कुमार। सेस शेषनाग।

संत-चिंतत संतों द्वारा जिनका चिंतन किया जाता है। रमा  लक्ष्मी। चेतन चैतन्य

ज्ञान-युक्त। अंतसकरन अंतःकरण। हरि-पुर-धरन वैकुंठ में वास कराने वाले।

मकरंद पराग।रु अरु और।

टिप्पणी 

परसि गंगा॥।उद्धरन पुराणों में कहा गया है कि जब वामन भगवान् ने 

राजा बलि से दान में प्राप्त पृथ्वी को अपने पैर से नापा तब अंगूठे के लगने से 

हिमालय से गंगा की उत्पत्ति हु। इसी से गंगा-जल को हरि-चरणोदक मानते हैं।

वात्सल्य

२७ धनाश्री 

जसोदा हरि पालने झुलावै।

हलरावै दुलरा मल्हावै जो सो कछु गावै॥

मेरे लाल को आ निंदरिया काहै न आनि सुवावै।

तू काहे नहिं बेगहिं आवै तो कों कान्ह बुलावै॥

कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावै।

सोवत जानि मौन ह्वै के रहि करि करि सैन बतावै॥

इहिं अंतर अकुला उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।

जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद-भामिनि पावै॥१॥

शब्दार्थ

पालना झूला। हलरावै हाथ में लेकर हिलाती है। मल्हावै पुचकारती 

है। जो सो कछु गावै  मन में जो आता है वही योंही कुछ गुनगुनाती है।

निंदरिया  नींद। सैन आंख का इशारा। मधुरै  धीरे-धीरे सुर में।

नंद-भामिनि नंद की पत्नी यशोदा।

टिप्पणी 

मेरे लाल कों॥।बुलावे में बच्चे को सुलाने के समय का माता का यह

गीतोद्गार बड़ा स्वाभाविक है। फिर सोवत जानि॥।बतावै इस पंक्ति में माता की 

प्रकृति का कितना अच्छा मनोवैज्ञानिक चित्षण किया गया है। उधर कबहुं पलक॥।फरकावै

और इहिं अन्तर अकुला उठें आदि में हैं शिशु की स्वाभाविक क्रियां।

बाललीला का यह रस देवतां और मुनियों को भी दुर्लभ है।

२८ धनाश्री 

सुत-मुख देखि जसोदा फूली।

हरषित देखि दूध की दंतुली प्रेम-मगन तन की सुधि भूली॥

बाहिर तें तब नंद बुला देखौं धौ सुन्दर सुखदा। 

तनक-तनक-सी दूध-दंतुलियां देखौ नैन सफल करौं आ॥

आनंद सहित महर तब आये मुख चितवत दो नैन अघा।

सूर स्याम किलकत द्विज देखे मानों कमल पर बिज्जु जमा॥२॥

शब्दार्थ

फूली  प्रसन्न हु। दंतुली  छोटे-छोटे दांत। तनक-तनक-सी जरा-सी।

महर गोप नंद बाबा से तात्पर्य है। द्विज  दांत। बिज्जु बिजली।

टिप्पणी 

मनो कमल पर बिज्जु जमा मानो मुख-कमल पर दंत-रूपी दामिनि जड़ी हु 

है। दूध की दंतुलियां निकल आने पर माता को कितनी प्रसन्नता होती है।

२९ धनाश्री 

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।

मनिमय कनक नंद के आंगन बिंब पकरिबे धावत॥

कबहुं निरखी हरि आपु छांह कों कर सों पकरन चाहत।

किलकि हंसत राजति द्वै दंतियां पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत॥

कनकभूमि पर कर पग छाया यह उपमा इक राजत।

करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा कमल बैठकी साजत॥

बालदशा सुख निरखी जसोदा पुनि-पुनि नंद बुलावति।

अंचरा तर लै ढांकि सूर प्रभु जननी दूध पियावति॥३॥

शब्दार्थ

किलकत  किलकारी देते हैं। घुटुरुवनि घुटनों के बल। बिंब परछाहीं

कनक सुवर्ण। प्रतिमन  प्रतिमां को। अंचरा आंचल।

टिप्पणी 

कनक-भूमि॥।साजत सुवर्ण की धरती पर कृष्ण के हाथ-पैरों की परछाहीं 

पड़ रही है  मानो पृथ्वी कृष्ण के प्रत्येक चरण की मूर्ति बनाकर अपनी कमल की बैठक 

सजा रही है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित सूर-सुषमा में पंडित 

नण।ह्ददुलारे वाजपेयी ने कमल बैठकी के बड़े सुन्दर अर्थ कि हैं 

इसके दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो कमल की बैठक दूसरा कमल से बैठक सजा रही है।

पृथ्वी अपनी कमल की बैठक सजा रही है अर्थात अपना सरोज-सदन सजा रही है।

दूसरे अर्थ में पृथ्वी कृष्ण के चरणों की प्रतिमा बनाती और हाथों के कमलों से अपनी

बैठक सजाती है। पहले अर्थ में अधिक चमत्कार है किन्तु दूसरा अर्थ अधिक स्पष्ट है 

३० आसावरी 

खेलत नंद-आंगन गोविन्द।

निरखि निरखि जसुमति सुख पावति बदन मनोहर चंद॥

कटि किंकिनी कंठमनि की द्युति लट मुकुता भरि माल।

परम सुदेस कंठ के हरि नखबिच बिच बज्र प्रवाल॥

करनि पहुंचियां पग पैजनिया रज-रंजित पटपीत।

घुटुरनि चलत अजिर में बिहरत मुखमंडित नवनीत॥

सूर विचित्र कान्ह की बानिक कहति नहीं बनि आवै।

बालदसा अवलोकि सकल मुनि जोग बिरति बिसरावै॥४॥

शब्दार्थ

किंकिनी करधनी। लट अलक। मुकुता भरि  मोतियों से गुही हु।

सुदेस सुंदर। केहरि नख बघनखा बाघ के नख जो बच्चों के गले में सोने से मढ़कर 

पहना दिये जाते हैं। बज्र हीरा। प्रवाल  मूंगा। रज-रंजित धूल से सना हुआ।

अजिर  आंगन। मुख-मंडित नवनीत मुंह मक्खन से सना हुआ है। बानिक शोभा।

३१ देवगंधार 

सिखवति चलन जसोदा मैया।

अरबरा कैं पानि गहावति डगमगा धरनी धरै पैया॥

कबहुंक सुन्दर बदन बिलोकति उर आनंद भरि लेति बलैया।

कबहुंक कुल-देवता मनावति चिर जीवहु मेरी कुंवर कन्हैया॥

कबहुंक बलकों टेरि बुलावति इहिं आंगर खेलौ दो भैया।

सूरदास स्वामी की लीला अति प्रताप बिलसत नंदरैया॥५॥

शब्दार्थ

अरबरा कैं  जल्दी में घबराकर। पानि गहावति  हाथ पकड़ाती है।

पैयां  छोटे-छोटे पैर। बल बलराम। टेरि पुकारकर।

टिप्पणी

दो डग आगे रखकर नंदनंदन जब अरबराकर गिरने लगते हैं तब यशोदा अपना हाथ 

पकड़ाकर फिर चलाने लगती हैं बार-बार सुन्दर मुख देखती और बलैया लेती हैं। जब अपने

-आप थोड़ा-सा चलने लगते हैं तब बलराम को पुकार कर बुलाती और कहती हैं देखो 

तुम्हारा भैया कैसा खेलता है आ दोनों भा यहीं आंगन में खेलो।

३२ रामकली 

मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी।

किती बार मोहिं दूध पिवत भ यह अजहूं है छोटी॥

तू तो कहति बल की बैनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।

काढ़त गुहत न्हवावत ओंछत नागिनि-सी भुंई लोटी॥

काचो दूध पिवावति पचि-पचि देति न माखन रोटी।

सूर स्याम चिरजीवौ दो भैया हरि-हलधर की जोटी॥६॥

शब्दार्थ

किती बार  कितना समय कितने दिन यानी बहुत दिन। बल  बलदेव।

बेनी  चोटी। काढ़त बनाते हु। ओंछत कंघी करते हु। भुं  भूमि जमीन।

पचि-पचि जैसे तैसे। कठिना से  हलधर बलदेव। जोटी  जोड़ी।

टिप्पणी 

काचो॥॥रोटी मैया तू मुझे कच्चा दूध पिलाती है वह भी राजी से 

नहीं। मक्खन-रोटी तू मुझे देती नहीं। दा को देती है। हां इसीलि उनकी चोटी लंबी 

और मोटी है।

३३ रामकली 

मेरी मा हठी बालगोबिन्दा।

अपने कर गहि गगन बतावत खेलन कों मांगै चंदा॥

बासन के जल धर।ह्‌यौ जसोदा हरि कों आनि दिखावै।

रुदन करत ढ़ूढ़ै नहिं पावतधरनि चंद क्यों आवै॥

दूध दही पकवान मिठा जो कछु मांगु मेरे छौना।

भौंरा चकरी लाल पाट कौ लेडुवा मांगु खिलौना॥

जो जो मांगु सो-सो दूंगी बिरुझै क्यों नंद नंदा।

सूरदास बलि जा जसोमति मति मांगे यह चंदा॥७॥

शब्दार्थ

अपने कर गहि अपने हाथ से मेरा हाथ पकड़कर। बासन बर्तन।

छौना बच्चा। भौंरा लट्टू। पाट रेशम। लेडुआ  लट्टू घुमाने का डोरा।

बिरुझे क्यों  मचल क्यों रहा है 

टिप्पणी 

रुदन॥॥॥आवै बर्तन में जल भरकर यशोदा ने रख दिया और उसमें

चंद्र का प्रतिबिंब दिखाकर कहा देखो यह है चंदा मंगा दिया न मैंने तेरे लि।

कृष्ण ने उसे पकड़ना चाहा पर हाथ में परछाहीं क्यों आने लगी और भी अधिक रोने 

लगे। ज्यों-ज्यों उसे ढूंढते वह हाथ में नहीं आता था।

३४ रामकली 

प्रात समय उठि सोवत हरि कौ बदन उघारौ नंद।

रहि न सकत देखन कों आतुर नैन निसा के द्वंद॥

स्वच्छ सैज में तें मुख निकसत गयौ तिमिर मिटि मंद।

मानों मथि पय सिंधु फेन फटि दरस दिखायौ चंद॥

धायौ चतुर चकोर सूर मुनि सब सखि सखा सुछंद।

रही न सुधिहुं सरीर धीर मति पिवत किरन मकरंद॥८॥

शब्दार्थ

निसा के द्वंद रात्रि के झंझट से। पय-सिन्धु  दूध का समुद्र।

सुकंद  प्रसन्नचित्त। किरन मकरंद  सुन्दरतारूपी पराग।

टिप्पणी 

रहिन॥।द्वंद कृष्ण का सुन्दर शरीर देखने के लि नन्द बाबा के नेत्र

बड़े उत्कंठित हो रहे हैं। निगोड़ी नींद ने इतना बीच डाल दिया नहीं तो वे निरन्तर 

देखते ही रहते। रात्रि की यह सोने की झंझट बुरी है। उतनी देर तक मुखचंद्र को

नन्द बाबा के निद्रित नेत्र न देख सके। स्नेह-पथ में यह घाटा क्या कम है।

स्वच्छ सेज॥चंद स्वच्छ सेज में से कृष्ण ने मुख क्या खोला मानो दूध का समुद्र

मथे जाने पर उसमें से फेन अलग हो गया और चंद्रमा निकल पड़ा। फेन यहां सफेद चादर 

है उसके अलग करते ही मुख-चंद्र दीख पड़ा।

३५ गौरी 

मैया मोहिं दा बहुत खिझायौ।

मोसों कहत मोल कौ लिन।ह्हौं तू जसुमति कब जायौ॥

कहा कहौं इहिं रिस के मारे खेलत हौं नहि जात।

पुनि-पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥

गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्याम सरीर।

चुटकी दै दै हंसत ग्वाल सब सिखै देत बलबीर॥

तू मोहीं कों मारन सीखी दाहिं कबहुं न खीझै॥

मोहन-मुख रिस की ये बातें जसुमति सुनि-सुनि रीझै॥

सुनहु कान्ह बलभद्र चबा जनमत ही कौ धूत।

सूर श्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥९॥

शब्दार्थ

जायौ  जन्म दिया। रिस  गुस्सा। कत क्यों कैसा।

चुटकी दै दै  ताना मार-मारकर। बलबीर भा बलराम। कबहुं न खीझै  कभी नहीं 

डांटती। चबा चालाक। धूत कपटी। गोधन गाय रूपी धनबहुत सी गों। सौं शपथ।

टिप्पणी 

तू मोहीं॥॥।कबहुं न खीझै इस पंक्ति ने तो भाव में जान डाल दी है।

जब देखो तू मुझे ही डांटती-दपटती है। सीधे-सादे को सभी बुरा-भला कहते हैं।

मैया दा से तो तू कुछ नहीं कहती।

शपथ भी गायों की ग्वालिनी के लि गोधन से बड़ा धन और क्या हो सकता है  गाय ही 

धन है गाय ही धाम है और गाय ही धर्म है। अब भी कृष्ण विश्वास न करेंगे कि यशोदा 

ही उनकी माता है।

३६ कान्हरा 

सांझ भ घर आवहु प्यारे।

दौरत तहां चोट लगि जैहै खेलियौ होत सकारे॥

आपुहिं जा बांह गहि ल्या खेह रही लपटा।

सपट झारि तातो जल ला तेल परसि अन्हवा॥

सरस बसन तन पोंछि स्याम कौ भीतर ग लिवा।

सूर श्याम कछु करी बियारी पुनि राख्यौ पौढ़ा॥१०॥

शब्दार्थ

सकारे  सवेरे। खेह  धूल। सुपट सुन्दर वस्त्र।

झारि  धूल साफ करके। तातो  गरम। परसि लगाकर। बियारि ब्यालूरात का भोजन।

टिप्पणी 

दौरत॥॥।सकारे कहां दौड़ते फिरते हो  अंधेरे में कहीं गिर पड़ोगे 

तो चोट लग जायगी। बस करो सवेरे खेलना।

३७ बिहाग 

खेलत में को काको गुसैयां।

हरि हारे जीते श्रीदामा बरबसहीं कत करत रिसैयां॥

जाति पांति हम तें बड़ नाहीं नाहीं बसत तुम्हारी छैयां।

अति अधिकार जनावत हम पै हैं कछु अधिक तुम्हारे गैयां॥

रुहठि करै तासों को खेलै कहै बैठि जहं तहं सब ग्वैयां।

सूरदास प्रभु कैलो चाहत दांव दियौ करि नंद-दुहैया॥११॥

शब्दार्थ

गुसैयां स्वामी। श्रीदामा श्रीकृष्ण का एक सखा। 

बरबस हीं जबरदस्ती ही। कत क।ह्यौं। रिसैयां गुस्सा। छैयां छत्र-छायां के 

नीचे अधीन। रुहठि  बेमानी। ग्वैयां सुसखा।

टिप्पणी 

हार गये तो बहुत बुरा लगा। खेल में भी अपना विशेष अधिकार चाहते हैं 

श्रीदामा बिलकुल ठीक कहता है। भा जबरदस्ती ही अपनी जीत मनवाना चाहते हो 

रूठना हो रूठ जा हम तुमसे डरने वाले नहीं। खेल में कौन किसका मालिक और कौन 

किसका नौकर  फिर तुम हमसे बड़े किस बात में हो तुम भी ग्वाल हम भी ग्वाल।

तुम्हारी जमींदारी में तो हम बस नहीं रहे हैं। तुम राजा होगे तो अपने घर के हम 

लोगों पर शासन जताने आ हैं नंद के राजकुमार तुम्हारे खरिक में कुछ गौं अधिक हैं 

तो इसी से क्या तुम राजाधिराज हो ग जो खेल में बेमानी करता है उसके साथ कौन 

खेलेगा 

३८ गौरी 

सखा सहित गये माखन-चोरी।

देख्यौ स्याम गवाच्छ-पंथ है गोपी एक मथति दधि भोरी॥

हेरि मथानी धरी माट पै माखन हो उतरात।

आपुन ग कमोरी मांगन हरि हूं पा घात॥

पैठे सखन सहित घर सूने माखन दधि सब खा।

छूंछी छांड़ि मटुकिया दधि की हंस सब बाहिर आ॥

आ ग कर लियें मटुकिया घर तें निकरे ग्वाल।

माखन कर दधि मुख लपटायें देखि रही नंदलाल॥

भुज गहि लियौ कान्ह कौ बालक भाजे ब्रज की खोरि।

सूरदास प्रभु ठगि रही ग्वालिनि मनु हरि लियौ अंजोरि॥१२॥

शब्दार्थ

गवाच्छ झरोखा। हो था। माट मिट्टी का बड़ा बर्तन जिसमें दही मथा 

जाता है। कमोरी मिट्टी का छोटा-सा बर्तन जिसमें मक्खन निकालकर रखते हैं।

घात मौका। छूंछी खाली। खोरि गली। ठगि रही मोहित हो ग।

टिप्पणी 

ठगि रही ग्वालिनि चोर पकड़ तो लिया पर कुछ करते न बना। माखन-चोर की 

मोहनी छवि देखकर ग्वालिनी मोहित-सी हो ग। अब तक तो माखन ही चोरी गया था

अब मन भी चुरा लिया गया। भौली-भाली गोपी का मन बालगोविन्द ने अपनी मुट्ठी में कर

लिया। हाथ में माखन लिये और मुख पर दही का लेप किये गोपाल को देखकर मन हाथ में 

रखना बड़ा कठिन था।

३९ गौरी 

मैया री मोहिं माखन भावै।

मधु मेवा पकवान मिठा मोंहि नाहिं रुचि आवे॥

ब्रज जुवती इक पाछें ठाड़ी सुनति स्याम की बातें।

मन-मन कहति कबहुं अपने घर देखौ माखन खातें॥

बैठें जाय मथनियां के ढिंग मैं तब रहौं छिपानी।

सूरदास प्रभु अन्तरजामी ग्वालि मनहिं की जानी॥१३॥

शब्दार्थ

मधु स्वादिष्ट। नहिं रुचि आवै पसंद नहीं आते। मन-मन कहति  मन ही 

मन अभिलाषा करती है। ढिंग पास।

टिप्पणी 

मन-मन॥॥छिपानी कभी क्या ऐसा दिन होगा जब अपने घर मे गोपाल को

मैं माखन खाते हु देखूंगी अच्छा हो कि मैं छिपकर खड़ी हो जांगा और नंद-नंदन यह

जानकर कि अब यहां को नहीं है मथानी के पास बैठकर माखन खाने लगें।

४० देश 

गोपालहिं माखन खान दै।

सुनु री सखी को जिनि बोले बदन दही लपटान दै॥

गहि बहिया हौं लै कै जैहों नयननि तपनि बुझान दै।

वा पे जाय चौगुनो लैहौं मोहिं जसुमति लौं जान दै॥

तुम जानति हरि कछू न जानत सुनत ध्यान सों कान दै।

सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कों राखौं तन मन प्रान दै॥१४॥

शब्दार्थ

को जिनि बोलै बीच में को मत रोको।तपनि जलन। वापै यशोदा से।

जसुमतिलौं यशोदा के पास तक।

टिप्पणी 

नयननि तपनि बुझान दै  अरी सखी बीच में बोलकर विघ्न मत कर।

तू जानती नहीं कितने दिनों से यह अभिलाषा थी कि कभी कृष्ण को अपने घर में माखन 

खाते हु देखूं। वह आज कहीं पूरी हु है। इतनी बाकी और है कि मैं इस नन्हें-से

प्यारे चोर का हाथ पकड़कर यशोदा के पास ले जां। तू चुप रह। इस सुन्दर छवि की 

जलधारा से मुझे अपनी आंखों की जलन सिरा लेने दे।

४१ सारंग 

जसोदा कहां लौं कीजै कानि।

दिन प्रति कैसे सही जाति है दूध-दही की हानि॥

अपने या बालक की करनी जो तुम देखौ आनि।

गोरस खा ढूंढ़ि सब बासन भली परी यह बानि॥

मैं अपने मण-दिर के कोनैं माखन राख्यौ जानि।

सो जा तुम्हारे लरिका लोनों है पहिचानि॥

बूझी ग्वालिनि घर में आयौ नैकु व संका मानि।

सूर स्याम तब उत्तर बनायौ चींटी काढ़त पानि॥१५॥

टिप्पणी 

दिन प्रति॥।हानि एक दिन की बात हों तो जानें दूं। यह तो रोज-रोज

ही दूध-दही की चोरी हो रही है। कहां तक लिहाज किया जाय कहां तक नुकसान 

उठाया जाय  स्याम तब॥।पानि ने तुरंत बात बना दी बोले मैया इस ग्वालिनि

के घर दहीं थोड़ा ही खा रहा था  मैं तो दही देखकर उसमें की चीटियां हाथ से निकाल 

रहा था। इसने समझ लिया मैं दही चाट रहा था

४२ रामकली 

मैया मैं नहिं माखन खायौ।

ख्याल परे ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपटायौ॥

देखि तुही सीके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायौ।

तुहीं निरखि नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायौ॥

मुख दधि पौंछि बुद्धि इक कीन्हीं दौना पीठि दुरायौ।

डारि सांटि मुसुका जसोदा स्यामहिं कंठ लगायौ॥

बाल बिनोद मोद मन मोह्यौ भक्ति प्रताप-दिखायौ।

सूरदास यह जसुमति कौ सुख सिव बिरचि नहिं पायौ॥१६॥

शब्दार्थ

ख्याल परे मजाक करने की इच्छा से चोर बनाने की इच्छा से।

भाजन बर्तन। सींका सिकहर। कैसै करि पायौ  कैसे उतार सकता था।

बुद्धि तरकीब। सांटि  छड़ी।

४३ बिहाग 

कुंवर जल लोचन भरि भरि लैत।

बालक बदन बिलोकि जसोदा कत रिस करति अचेत॥

छोरि कमर तें दुसह दांवरी डारि कठिन कर बैत।

कहि तोकों कैसे आवतु है सिसु पर तामस एत॥

मुख आंसू माखन के कनिका निरखि नैन सुख देत।

मनु ससि स्रवत सुधाकन मोती उडुगन अवलि समेत॥

सरबसु तौ न्यौछावरि कीजे सूर स्याम के हेत।

ना जानौं केहिं पुन्य प्रगट भये इहिं ब्रज-नंद निकेत॥१७॥

शब्दार्थ

अचेत  व्यर्थ। दांवरी  डोरी रस्सी। तामस  गुस्सा। एत  इतना।

कनिका बूंदें। स्रवत टपकता है।

टिप्पणी 

एक गोपी शायद वही जो उलाहना देने आयी थी कृष्ण को इस तरह बंधन में 

पड़ा देखयशोदा से कहती हैअरी यशोदातनिक कन्हैया की ओर देख तो।बच्चे की आंखें

डबडबा आ हैं। क्यों इतना क्रोध कर रही है  यह कठिन डोरी कुंबर की कमर से खोल दे 

और यह छड़ी फेंक दे यह पांच बरस का निरा बच्चा ही तो है। कहीं नन्हें-से बालक पर 

इतना क्रोध किया जाता है  इस समय भी कुंवर कान्ह कैसा सुन्दर लगता है मुख पर 

आँसुं की बूंदें टपक रही हैं और माखन के कण भी इधर-उधर लगे हु हैं। ऐसा लगता है 

जैसे तारां सहित चंद्रमा अमृत के कणों और मोतियों की वर्षा कर रहा हो। यह शोभा भी 

नेत्रों को आनन्द देती है। यशोदा यह वह मोहिनी मूरत है जिस पर सर्वश्व न्यौछावर 

कर देना चाहि। न जाने पूर्व के किस पुण्य प्रताप से नन्द बाबा के घर में आकर इस 

सुन्दर बालक ने जन्म लिया है।

४४ सोरठ 

जसोदा तेरो भलो हियो है मा।

कमलनयन माखन के कारन बांधे ऊखल ला॥

जो संपदा दैव मुनि दुर्लभ सपनेहुं द न दिखा।

याही तें तू गरब भुलानी घर बैठें निधि पा॥

सुत काहू कौ रोवत देखति दौरि लेति हिय ला।

अब अपने घर के लरिका पै इती कहा जड़ता॥

बारंबार सजल लोचन ह्वै चितवत कुंवर कन्हा।

कहा करौं बलि जां छोरती तेरी सौंह दिवा॥

जो मूरति जल-थल में व्यापक निगम न खोजत पा।

सो महरि अपने आंगन में दै-दै चुटकि नचा॥

सुर पालक सब असुर संहारक त्रिभुवन जाहि डरा।

सूरदास प्रभु की यह लीला निगम नेति नित ग॥१८॥

शब्दार्थ

संपदा  धन संपत्ति। जड़ता निष्ठुरता कठोरता। सौंहकसम। थल स्थल

व्यापक पूर्ण। त्रिभुवन  तीन लोक। नेति  ऐसा नहीं।

टिप्पणी 

तेरो भलो॥॥मा धन्य है तेरा हृदय बड़ा अच्छा है अर्थात् बड़ा 

बुरा है बड़ा कठोर है।

सुत काहू॥॥जड़ता तेरा हृदय तो इतना सरस था कि किसी के भी बच्चे को रोता 

देखती तो दौड़कर उसे छाती से लगा लेती थी। न जाने अब तुझे क्या हो गया जो अपनी 

ही कोख के लाल पर तू इतना कठोरपन दिखा रही है।

कहा करौं॥॥दिवा अपने प्रति सहानुभूति दिखाने वाली उस गोपी की ओर कृष्ण

आंखें डबडबाकर जब बार-बार देखते हैं तब वह कहती है  क्या करूं मैं लाचार हूं।

मैं तुम्हारी मैया से नहीं डरती। अबतक तो मैंने यह रस्सी खोल दी होती। पर 

तुम्हारी ही सौगंध तुम्हारी मां ने मुझे रखा दी है। सो बंधन खोलने से लाचार हूं।

४५ सोरठ 

यह सुनिकैं हलधर तहं धाये।

देखि स्याम ऊखल सों बांधे तबहीं दो लोचन भरि आये॥

मैं बरज्यौ कै बार कन्हैया भली करी दो हाथ बंधाये।

अजहूं छांड़ोगे लंगरा दो कर जोरि जननि पै आये।

स्यामहिं छोरि मोहिं बरु बांधौ निकसतसगुन भले नहिं पाये।

मेरो प्रान जीवन धन भैया ताके भुज मोहिं बंधे दिखाये॥

माता सों कहि करौं ढिठा शेषरूप कहि नाम सुनाये।

सूरदास तब कहति जसोदादो भैया एकहिं मत भाये॥१९॥

शब्दार्थ

हलधर  बलराम। बरज्यौ रोका। लंगरा शरारत। जननि  माता यशोदा 

के पास। बरू चाहे भले ही। सगुन  शकुन।

टिप्पणी 

स्यामहि छोरि॥॥।दिखाये यशोदा मैया से बल राम कहते हैं मैया मेरे 

प्यारे जीवन धन भा को तू छोड़ दे। उसके बदले मुझे भले रस्सी से बांध ले। घर से 

निकलते आज इसी से अपशकुन हु थे। अपने प्यारे बा को मैंने आज आंखों बंधा हुआ 

देखा। पर यह कैसे हो सकता था कि अपराध तो करें कृष्ण और बांधे जायें बलराम

शेष-रूप कहि नाम सुनाये अब बलरामजी ने जरा तनकर कहा  तुम जानती नहीं मैं

कौन हूं। मैं साक्षात शेषनाग हूं। खोल दो इसी समय मेरे भा को। इस धमकी का भी

को असर न हुआ। मुस्कराकर यशोदा ने कहातुम दोनों ही भा बातें बनाना सीख गये हो। 

माखन का यह चोट्टा कहने लगता है कि मैं विष्णु भगवान् हूं और तू आज कहता है कि मैं

साक्षात् शेषनाग हूं।

४६ गोरी 

निरखि स्याम हलधर मुसुकानैं।

को बांधे को छोरे इनकों इन महिमा ए पै जानैं॥

उतपति प्रलय करत हैं ए सेष सहसमुख सुजस बखानैं।

जमलार्जुनहिं उघारन कारन करत अपन मनमानैं॥

असुर संहारन भगतहिं तारन पावन पतित कहावत बानैं।

सूरदास प्रभु

भाव

-भगति के अति हित जसुमति हाथ बिकाने॥२०॥

शब्दार्थ

उतपति  उत्पत्ति सृष्टि रचना। कारन करत  कारण अर्थात हेतु निकाल 

लेते है। बानैं विरुद्ध।

कृष्ण को बंधन में पड़ा देखकर बलराम मन-ही-मन मुसकराये और कहने लगे इन्हें कौन 

बांध सकता है और कौन खोल सकता है इनकी महिमा यही जानें। यही सृष्टि रचते हैं और 

यही संहार करते हैं। इनका यशोगान शेष सहस्र मुखों से ही करते हैं। इन्हीं ने तो आज

स्वयं ही अपने को बंधाने का एक हेतु निकाल लिया है। बात यह है कि यमलार्जुन का 

उद्दार करना था। राक्षसों को मारने वाले भक्तों को मुक्ति देने वाले और पापियों 

का उद्धार करने वाले यही तो हैं। यह सदा भक्ति के अधीन हैं इसी कारण यशोदा मैया के 

वश में हो गये हैं।

इस समस्त पद में श्रीकृष्ण की ईश्वरता ही दिखा ग है। यमलार्जुन उद्धार के 

प्रसंग में ईश्वरता की निदर्शन करना आवश्यक था। यमलार्जुन नलकूबर और मणिग्रीव 

नामक दो कुबेर पुत्र नारद के शाप से ब्रज में जुड़वां अर्जुन वृक्ष के रूप में पैदा 

हु थे। उन्हें सान्त्वना दे दी ग थी कि श्रीकृष्ण के स्पर्श से उनका उद्धार होगा 

वही हुआ। वे दोनों वृक्ष धड़ाम से गिर पड़े और नलकूबर के रूप में उन्होंने भगवान्

की स्तुति की। दोनों भा शाप-मुक्त होकर पिता कुबेर के लोक में चले गये।

४७ आसावरी 

मैया हौं गाय चरावन जैहों।

तू कहि महर नंद बाबा सों बड़ो भयौ न डरैहौं॥

रैता पैता मना मनसुखा हलधर संगहिं रैहौं।

बंसीबट तर ग्वालिन के संग खेलत अति सुख पैहौं॥ 

ओदन भोजन दै दधि कांवरि भूख लगे तैं खैहौं।

सूरदास है साखि जमुन जल सौंह देहु जु नहैहौं॥२१॥

शब्दार्थ

रैता पैता मनामनसुखा-श्रीकृष्ण के बाल-सखां के नाम। हलधर बलराम। 

रैहों  रहूंगा। बंसीबट एक वृक्ष जिसके नीचे श्रीकृष्ण बंसी बजाया करते थे। आज 

भी वृंदावन में यमुना-तट पर बंसीवट प्रसिद्ध है। ओदन भात। कांवरि  बहंगी एक 

लकड़ी के दोनों सिरों पर पात्र बंधे होते हैं जिनमें जल दूध दही आदि चीजें ढो 

जाती है। कावर कन्धे पर रखी जाती है। साखि साक्षी।

टिप्पणी 

तू कहि डरै॥।हरौं मैया अब तो तू नंद बाबा से सिफारिश कर दे। मैं 

देख कितना बड़ा हो गया हूं। मुझे बन में जाते कुछ भी डर न लगेगा।

है साखि॥। नहै हौं मैया तू सदा यह आशंका किया करती है कि कृष्ण कहीं यमुना में

डूब न जाय तो मैं यमुना जल की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं कभी उसमें न नहांगा।

तू मेरा विश्वास रख।

४८ सारंग 

आ छाक बुलाये स्याम।

यह सुनि सखा सभै जुरि आये सुबल सुदामा अरु श्रीदाम॥

कमलपत्र दौना पलास के सब आगे धरि परसत जात।

ग्वालमंडली मध्यस्यामधन सब मिलि भोजन रुचिकर खात॥

ऐसौ भूखमांझ इह भौजन पठै दियौ करि जसुमति मात।

सूर स्याम अपनो नहिं जैंवत ग्वालन कर तें लै लै खात॥२२॥

शब्दार्थ

छाक  वह भोजन जो खेत पर या चरागाह पर भेज दिया जाता है।

ब्रज में यह भोजन महेरी माखन-रोटी आदि का होता है। सुबल सुदामा श्रीदामा 

ग्वाल बालों के नाम। पलास ढाक। परसत जात  परोसे जाते हैं। 

रुचिकरि बड़े स्वाद से। करि  बनाकर।

टिप्पणी 

ऐसी भूख॥ंआत कैसी कड़ाके की भूख लगी थी। जसोदा मैया बड़ी भली है 

जो इस भूख में ताजी छाक तैयार करके यहां भेज दी है।

स्याम॥॥खात ग्वालबालों के हाथ से छीन छीनकर श्रीकृष्ण खाते हैं अपनी छाक इतनी 

मीठी नहीं लगती जितनी कि उन सबके पत्तलों की।

४९ बिलावल 

आजु बन बन तैं ब्रज आवत।

रंग सुरंग सुमन की माला नंद नंदन उर पर छबि पावत॥

ग्वाल बाल गोधन संग लीनें नाना गति कौतुक उपजावत।

को गावत को नृत्य करत को उघटत को ताल बजावत॥

रांभति गाय बच्छ हित सुधि करि प्रेम उमंगि थन दूध चुवावत।

जसुमति बोलि उठी हरषित ह्वै कान्हा धेनु चराये आवत॥ 

इतनी कहत आय गये मोहन जननी दौरि हियें लै लावत।

सूर स्याम के कृत जसुमति सों ग्वाल बाल कहि प्रकट सुनावत॥२३॥

शब्दार्थ

कौतुक आश्चर्य आनंद। उघटत फूदता है। रांभति रंभाती है जोर से 

शब्द करती है। हियें ले हृदय लगाकर।

टिप्पणी 

नाना गति॥॥उपजावत ग्वाल-बाल अनेक प्रकार के नाच-कूद से आनन्द पैदा 

कर रहे हैं को किसी गति से चला आ रहा है तो को किसी गति से।

रांभति॥॥चुवावत गाय अपने बछड़े की याद करके दौड़ती हु चली आ रही है।

बार-बार रंभाती है थनों से दूध मानों चू रहा है।

स्याम के कृत दिन भर की कृष्ण की बातें जैसे इन्होंने मैया बड़ा ऊधम मचाया 

कहीं इस पेड़ पर चढ़े कहीं उस पेड़ पर जमुना में भी खूब नहाये श्रीदामा से लड़ा 

की और सुबल से मित्रता आदि शिकायतें। पर गाय चराने की तो सबने तारीफ ही की होगी

कारण कि गोचारण में गोपाल बड़े कुशल थे। यही सब कृत्य थे कृष्ण के। इन्हीं सब 

बातों को बढ़ा-चढ़ा कर यशोदा के सामने कहा गया।

५० गौरी 

जसुमति दौरि लिये हरि कनियां।

आजु गयौ मेरौ गाय चरावन हौं बलि जां निछनियां॥

मो कारन कचू आन्यौ नाहीं बन फल तोरि नन्हैया।

तुमहिं मिलैं मैं अति सुख पायौमेरे कुंवर कन्हैया॥

कछुक खाहु जो 

भाव

इ मोहन। दैरी माखन रोटी।

सूरदास प्रभु जीवहु जुग-जुग हरि-हलधर की जोटी॥२४॥

शब्दार्थ

कनियां  गोदी। मेरौ  मेरा लाल ब्रजभाषा में सिर्फ मेरा और मेरी से 

ही पुत्र और पुत्री का बोध हो जाता है। निछनियां पूरे तौर से। मो कारन मेरे लि

नन्हैया  नन्हा-सा छोटा-सा। जोटी जोड़ी।

टिप्पणी 

मेरे नन्हें-से लाल अपनी मैया के लि कुछ वन के फल तोड़कर नहीं लाये 

मैंने योंही कहा कन्हैया तुझे पाकर मुझे क्या नहीं मिल गया। भूख तो लगी ही होगी 

चल जो तुझे 

भाव

इ सो खा ले।  दैरी माखन रोटी  सर्वस्व तो माखन रोटी ही है।

वन-वन गाय चराने वाली यह हरि-हलधर की प्यारी जोड़ी जुग-जुग चिरंजीवी रहे।

५१ नट 

मैया हौं न चरैहों गा।

सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों मेरे पां पिरांइ॥

जौ न पत्याहि पूछि बलदाहिं अपनी सौंह दिवा।

यह सुनि मा जसोदा ग्वालनि गारी देति रिसा॥

मैं पठवति अपने लरिका कों आवै मन बहरा।

सूर श्याम मेरो अति बारो मारत ताहि रिंगा॥२५॥

शब्दार्थ

घिरावत इधर-उधर से हांककर एक जगह करना। न पत्याहि विश्वास न करे।

सौंह कसम। आवै मन बहरा  मन बहला आवै। बारो  बालक। मारत रिंगा  चला-चला

कर थका डालते हैं। 

रूप-माधुरी

५२ धनाश्री 

जौ बिधिना अपबस करि पां।

तौ सखि कह्यौ हौ कछु तेरो अपनी साध पुरां॥

लोचन रोम-रोम प्रति मांगों पुनि-पुनि त्रास दिखां।

इकटक रहैं पलक नहिं लागैं पद्धति न चलां॥

कहा करौं छवि-रासि स्यामघन लोचन द्वे नहिं ठां।

एते पर ये निमिष सूर  सुनि यह दुख काहि सुनां॥१॥

शब्दार्थ

बिधिना विधाता ब्रह्मा। अपबस अपने वश में। साध पुरां इच्छा पूरी 

करूं। त्रास डांट-दपट भय। पद्धति रीति। ठां स्थान। निमिष  पलक।

टिप्पणी 

तौ सखि॥॥तेरो सखी तूने कृष्ण की छवि देखने को कहा है पर इन दो 

छोटी-छोटी आंखों से उस अनंत रूप राशि कौ कैसे निरखूं  यदि विधाता को किसी तरह वश 

में कर सकूं तो तेरा भी कहना सफल हो जाय और कृष्ण को देखने की मेरी लालसा भी पूरी 

हो जाय।

कहा करौं॥॥ठां क्या करूं श्यामसुंदर तो सौन्दर्य के सागर हैं उन्हें इन दो 

नेत्रों में बसा सकती हूं। स्थान ही नहीं लाचारी है।

एते पर॥।सुनां एक तो दोही आंखें फिर पलकों का बार-बार लाना यह और भी बला 

है। सदा खुली ही रहतीं पलक न गिरते तो फिर भी कुछ संतोष हो जाता। एकटक देखती

तो रहती। पर वह भी अब होने का नहीं।

५३ देश 

नैन भये बोहित के काग।

उड़ि उड़ि जात पार नहिं पावैं फिरि आवत इहिं लाग॥

ऐसी दसा भ री इनकी अब लागे पछितान।

मो बरजत बरजत उठि धाये नहीं पायौ अनुमान॥

वह समुद्र ओछे बासन ये धरैं कहां सुखरासि।

सुनहु सूर ये चतुर कहावत वह छवि महा प्रकासि॥२॥

शब्दार्थ

बोहित जहाज। लाग स्थान। बरजत रोकते हु। ओछे बासन छोटे बर्तन।

टिप्पणी 

उड़ि उड़ि॥॥लाग ये नेत्र संसार की दूसरी-दूसरी वस्तुं भी देखते 

हैं पर उन पर दृष्टि स्थिर नहीं रहती। अटके हु तो ये कृष्ण छवि में ही हैं बार-

बार वहीं चले जाते हैं। सारा कृष्ण सौन्दर्य का सागर है जिसका पार पाना कठिन है।

जहां तक दृष्टि जाती है सौन्दर्य-ही-सौन्दर्य है। उस सौन्दर्य को छोड़कर इन

नेत्रों के लि कहीं और आश्रय ही नहीं।

ये चतुर॥॥प्रकासि नेत्र बड़े चतुर समझे गये हैं पर उस असीम सुंदरता के सामने

इनकी चतुरा नहीं चलती वहां तो ये भी ठग लिये ग हैं।

५४ कल्याण 

धनि यह वृन्दावन की रैनु।

नंदकिसोर चरा गैयां बिहरि बजा बैनु॥

मनमोहन कौ ध्यान धरै जो अति सुख पावत चैनु।

चलत कहां मन बसहिं सनातन जहां लैनु नहीं दैनु॥

यहां रहौ जहं जूठन पावैं ब्रजवासी के ऐनु।

सूरदास ह्यां की सरबरि नहिं कल्पवृच्छ सुरधैनु॥३॥

शब्दार्थ

रेनु  रजधूल। बेनु बंशी। चैनु चैन आनन्द। 

जहां लैनु नहिं देनु जहां किसी तरह का को झंझट नहीं। सनातन सदा।

ऐनु अयन घर। सरबरि तुलना।

५५ बिहाग 

नटवर वेष काछे स्याम।

पदकमल नख-इन्दु सोभा ध्यान पूरनकाम॥

जानु जंघ सुघट निका नाहिं रंभा तूल।

पीतपट काछनी मानहुं जलज-केसरि झूल॥

कनक-छुद्वावली पंगति नाभि कटि के मीर।

मनहूं हंस रसाल पंगति रही है हृद-तीर॥

झलक रोमावली सोभा ग्रीव मोतिन हार।

मनहुं गंगा बीच जमुना चली मिलिकैं धार॥

बाहुदंड बिसाल तट दो अंग चंदन-रेनु।

तीर तरु बनमाल की छबि ब्रजजुवति-सुखदैनु॥

चिबुक पर अधरनि दसन दुति बिंब बीजु लजा।

नासिका सुक नयन खंजन कहत कवि सरमा॥

स्रवन कुंडल कोटि रबि-छबि प्रकुटि काम-कोदंड।

सूर प्रभु हैं नीप के तर सिर धरैं स्रीखंड॥४॥

शब्दार्थ

नटवर  नृत्यकरनेवालों में श्रेष्ठ। काछे बनाये हु।

इंदु चन्द्रमा। पूरनकाम  मनोवांछां पूरी करने वाला। जानु  घुटना। 

सुघट बनावट। निका  शोभा। तूल  तुल्य बराबर। रंभा केला।

काछनी घेरदार जामा। कनक छुद्रावली सोने की करधनी। जलज केसरि  कमल केसर।

पंगति  पंक्ति कतार। हृद तीर  तालाब का किनारा। बिंब  एक लाल फल जिसे कुंदरू 

कहते हैं। बीजु बिजली। भ्रकुटि  भौंह। काम-कोदंड कामदेव का धनुष। नीप  कदंब।

स्रीखंड  मोर के पंखे।

टिप्पणी 

देखो आज श्यामसुन्दर ने नटवर का भेष धारण किया है। इस रूप का ध्यान 

सारी कामनां पूरी करता है।

चरण कमलों का तनिक ध्यान तो धरो। पैरों के नख तो मानो दुज के चन्द्र हैं।

जानु भी बड़े सुन्दर हैं।

जंघां की सुन्दर बनावट को केले का वृक्ष कहीं पा सकता है  उसकी उपमा तुच्छ है।

पीले वस्त्र की काछनी क्या है मानो कमल की केसर घुटनों के चारों ओर लहरा रही है।

उधर नाभि और कमर के पास सोने की करधनी की लड़ें ऐसी जान पड़ती हैं जैसे सुन्दर 

हंसावली तालाब के तट पर विहार कर रही हो। 

यहां तालाब नाभि का उपमान माना गया है 

फिर वही भूमावली और गले में पड़ा हुआ मोतियों का हार ऐसा शोभित हो रहा है मानो 

गंगा के मध्य में यमुना की धारा मिलकर बह रही हो।

यहां मोतियों का हार ही गंगा 

की धवल धारा है और उसके बीच में रोमावली श्याम यमुना है।

उस गंगा-यमुना की धारा के दोनों तट क्या हैं बड़े-बड़े बाहु। शरीर में चन्दन का 

लेप लगा हुआ है वह मानो उन सरितां की रेणुका है।

वहीं तुलसी दल तथा अन्य पुष्पों की वनमाला नदी तट की वृक्षावली के समान शोभा दे रही

है। चिबुक के ऊपर अरुण ओठों के आगे बिंबापल और दंतपंक्ति के आगे विद्युत भी लज्जित 

हो रही है। 

नासिका को तोते की उपमा देते और नेत्रों को खञ्जन कहते कवि को संकोच होता है।

ये उपमां अन्यत्र भले ही ठीक बैठती हों पर यहां तो तुच्छ हैं।

कानों के मकराकृत कुण्डलों की आभा करोड़ों सूर्यों के समान है और भौंहें तो मानो 

कामदेव की कमानें हैं।

सूरदास कहते हैं कैसा सुन्दर नटवर वेश है कदंब के नीचे आप खड़े हैं और सिर पर मोर 

पंखों का मुकुट धारण किये हु हैं।

५६ पूर्वी 

मुरली गति बिपरीत करा।

तिहुं भुवन भरि नाद समान्यौ राधारमन बजा॥

बछरा थन नाहीं मुख परसत चरत नहीं तृन धेनु।

जमुना उलटी धार चली बहि पवन थकित सुनि बेनु॥

बिह्वल भये नाहिं सुधि काहू सूर गंध्रब नर-नारि।

सूरदास सब चकित जहां तहं ब्रजजुवतिन सुखकारि॥५॥

शब्दार्थ

गति  संसार की चाल। बिपरीत  उलटी। परसत छूते हैं लगाते हैं।

गंध्रब  गंधर्व। चकित स्तम्भित जहां-तहं चित्र-लिखे से।

टिप्पणी 

मुरली नाद ने समस्त संसार पर अपना अधिकार जमा लिया है।

दुनिया मानो उसके इशारे पर नाच रही है। तीनों लोकों में वंशी की ही ध्वनि भर ग है 

सब चित्रलिखे-से दिखा देते हैं। बछड़ा अपनी मां के थन को छूता भी नहीं। गौं मुंह 

में तृण भी नहीं दबातीं। और जमुना वह तो आज उलटी बह रही है।

पवन की भी चंचलता रुक ग है। वह भी ध्यानस्थ हो मुरली-नाद में मस्त हो रही है।

सभी बेसुध हैं।

देव और गन्धर्व तक प्रेम-विह्वल है फिर नर-नारियों का तो कहना ही क्या  

५७ रामकली 

संदेसो दैवकी सों कहियौ।

हौं तौ धाय तिहारे सुत की मया करति नित रहियौ॥

जदपि टेव जानति तुम उनकी त मोहिं कहि आवे।

प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्हहिं माखन-रोटी 

भाव

इ॥

तेल उबटनों अरु तातो जल देखत हीं भजि जाते।

जो-जो मांगत सो-सो देती क्रम-क्रम करिकैं न्हाते॥

सुर पथिक सुनि मोहिं रैनि-दिन बढ्यौ रहत उर सोच।

मेरो अलक लडैतो मोहन ह्वै है करत संकोच॥२॥

शब्दार्थ

मया  दया। त  तोभी। टेव आदत। उबटनो बटना तिल चिरौंजी आदि 

पीसकर शरीर में लगाने की चीज जिससे मैल छूट जाता है और शरीर का रूखापन दूर हो जाता

है। तातो गरम। भजि जाते  भाग जाते थे। क्रम-क्रम करिकैं धीरे-धीरे।

अलक लड़ैतो  प्यारा।

टिप्पणी 

मैं तो तुम्हारे पूत की मात्र एक धाय हूं इसलि सदा से दया बना रखना

जदपि टेव॥।आवै तुम्हारा तो वह लड़का ही ठहरा तुम उसकी आदतें जानती ही हो पर

ढिढा क्षमा करना पाला-पोसा तो मैंने ही उसे है  उसकी कुछ खास-खास आदतें मैं ही 

जानती हूं सो कुछ निवेदन मुझे करना ही पड़ता है।

ह्वै-है करत संकोच तुम्हारे घर को वह पराया घर समझता होगा और मेहमान की तरह वहां 

मेरा कन्हैया संकोच करता होगा।

५८ सोरठ 

मेरो कान्ह कमलदललोचन।

अब की बेर बहुरि फिरि आवहु कहा लगे जिय सोचन॥

यह लालसा होति हिय मेरे बैठी देखति रैहौं॥

गा चरावन कान्ह कुंवर सों भूलि न कबहूं कैहौं॥

करत अन्याय न कबहुं बरजिहौं अरु माखन की चोरी।

अपने जियत नैन भरि देखौं हरि हलधर की जोरी॥

एक बेर ह्वै जाहु यहां लौं मेरे ललन कन्हैया।

चारि दिवसहीं पहुन कीजौ तलफति तेरी मैया॥३॥

शब्दार्थ

कमलदललोचन कमल पत्र के समान नेत्र हैं जिनके। बेर बार। 

रैहौं रहूंगी। कहौं कहूंगी। अन्याय उत्पातऊधम। बरजिहौं रोकूंगी।

जोरी जोड़ी। पहुनै  मेहमानी।

टिप्पणी 

करत॥॥चोरी शायद तुम इसलि रूठकर मथुरा में जाकर बस ग हो कि मैंने 

तुम्हें कभी-कभी डांटा था। सो अब कभी नहीं डांटूंगी। कितना ही तुम ऊधम करो कभी 

रोकूंगी नहीं। माखन-चोरी के लि भी अब तुम्हारी छूट रहेगी। अब तो सब ठीक है न। 

तो फिर चले आ न मेरे लाल।

रैहौं॥॥कैहौं ये दोनों बुन्देलखंडी बोली के प्रयोग हैं।

५९ गौरी 

कहियौ नंद कठोर भये।

हम दो बीरैं डारि परघरै मानो थाती सौंपि गये॥

तनक-तनक तैं पालि बड़े किये बहुतै सुख दिखराये।

गो चारन कों चालत हमारे पीछे कोसक धाये॥

ये बसुदेव देवकी हमसों कहत आपने जाये।

बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाये॥

कौन काज यहि राजनगरि कौ सब सुख सों सुख पाये।

सूरदास ब्रज समाधान करु आजु-काल्हि हम आये॥४॥

शब्दार्थ

बीरैं भायों को। परघरै दूसरे के घर में। थाती  धरोहर। 

तनक-तनक तें छुटपन से। कोसक एक कोस तक। समाधान सझना शांति।

टिप्पणी 

श्रीकृष्ण अपने परम ज्ञानी सखा उद्धव को मोहान्ध ब्रजवासियों में ज्ञान 

प्रचार करने के लि भेज रहे हैं। इस पद में नंद बाबा के प्रति संदेश भेजा है। कहते

है

बाबा  तुम इतने कठोर हो गये हो कि हम दोनों भायों को पराये घर में धरोहर की 

भांति सौंप कर चले ग। जब हम जरा-जरा से थे तभी से तुमने हमें पाल-पोसकर बड़ा 

किया अनेक सुख दि। वे बातें भूलने की नहीं।

जब हम गाय चराने जाते थे तब तुम एक कोस तक हमारे पीछे-पीछे दौड़ते चले आते थे।

हम तो बाबा सब तरह से तुम्हारे ही है।

पर वसुदेव और देवकी का अनधिकार तो देखो। ये लोग नंद-यशोदा के कृष्ण-बलराम को आज 

अपने जाये पूत कहते हैं।

वह दिन कब होगा जब हमें यशोदा मैया फिर अपनी गोद में खिलायेंगी। इस राजनगरी 

मथुरा के सुख को लेकर क्या करें  हमें तो अपने ब्रज में ही सब प्रकार का सूख था।

उद्धव तुम उन सबको अच्छी तरह से समझा-बुझा देना और कहना कि दो-चार दिन में हम 

अवश्य आयेंगे।

६० सारंग 

नीके रहियौ जसुमति मैया।

आवहिंगे दिन चारि पांच में हम हलधर दो भैया॥

जा दिन तें हम तुम तें बिछुरै कह्यौ न को कन्हैया।

कबहुं प्रात न कियौ कलेवा सांझ न पीन्हीं पैया॥

वंशी बैत विषान दैखियौ द्वार अबेर सबेरो।

लै जिनि जा चुरा राधिका कछुक खिलौना मेरो॥

कहियौ जा नंद बाबा सों बहुत निठुर मन कीन।ह्हौं।

सूरदास पहुंचा मधुपुरी बहुरि न सोधौ लीन।ह्हौं॥५॥

शब्दार्थ

नीके रहियौ  को चिम्ता न करना। न पीन्हीं पैया  ताजे दूध की धार 

पीने को नहीं मिली। बिषान  सींग 

बजाने का। अबेर सबेरी  समय-असमय बीच-बीच में 

जब अवसर मिले। सोधौ खबर भी।

टिप्पणी 

कह्यौ न को कन्हैया यहां मथुरा में तो सब लोग कृष्ण और यदुराज के नाम 

से पुकारते है मेरा प्यार का कन्हैया नाम को नहीं लेता।

लै जिनि जा चुरा राधिका राधिका के प्रति १२ बर्ष के कुमार कृष्ण का निर्मल 

प्रेम थायह इस पंक्ति से स्पष्ट हो जाता है।राधा कहीं मेरा खिलौना न चुरा ले जाय 

कैसी बालको-चित सरलोक्ति है।

६१ देश 

जोग ठगौरी ब्रज न बिकहै।

यह ब्योपार तिहारो ऊधौ ऐसो फिरि जैहै॥

यह जापे लै आये हौ मधुकर ताके उर न समैहै।

दाख छांडि कैं कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै॥

मूरी के पातन के कैना को मुकताहल दैहै।

सूरदास प्रभु गुनहिं छांड़िकै को निरगुन निरबैहै॥६॥

शब्दार्थ

ठगौरी  ठगी का सौदा। एसो फिरि जैहैं  योंही बिना बेचे वापस ले जाना 

होगा। जापै  जिसके लि। उर न समैहै  हृदय में न आगा। निबौरी नींम का फल।

मूरी  मूली। केना अनाज के रूप में साग-भाजी की कीमत जिसे देहात में कहीं-कहीं 

देकर मामूली तरकारियां खरीदते थे। मुकताहल  मोती। निर्गुन सत्य रज और तमोगुण 

से रहित निराकार ब्रह्म।

टिप्पणी

उद्धव ने कृष्ण-विरहिणी ब्रजांगनां को योगभ्यास द्वारा निराकार ब्रह्म 

का साक्षात्कार करने के लि जब उपदेश दिया तो वे ब्रजवल्लभ उपासिनी गोपियां कहती 

हैं कि इस ब्रज में तुम्हारे योग का सौदा बिकने का नहीं। जिन्होंने सगुण ब्रह्म 

कृष्ण का प्रेम-रस-पान कर लिया उन्हें तुम्हारे नीरस निर्गुण ब्रह्म की बातें भला 

क्यों पसन्द आने लगीं  अंगूर छोड़कर कौन मूर्ख निबोरियां खायगा  मोतियों को देकर 

कौन मूढ़ बदले में मूली के पत्ते खरीदेगा  योग का यह ठग व्यवसाय प्रेमभूमि ब्रज 

में चलने का नहीं।

६२ टोडी 

ऊधो होहु इहां तैं न्यारे।

तुमहिं देखि तन अधिक तपत है अरु नयननि के तारे॥

अपनो जोग सैंति किन राखत इहां देत कत डारे।

तुम्हरे हित अपने मुख करिहैं मीठे तें नहिं खारे॥

हम गिरिधर के नाम गुननि बस और काहि उर धारे।

सूरदास हम सबै एकमत तुम सब खोटे कारे॥७॥

शब्दार्थ

न्यारे होहु  चले जा। सैंति  भली-भांति संचित करके।खोटे  बुरे।

टिप्पणी 

तुमहि॥॥।तारे तुम जले पर और जलाते हो एक तो कृष्ण की विरहाग्नि से 

हम योंही जली जाती है उस पर तुम योग की दाहक बातें सुना रहे हो। आंखें योंही जल 

रही है। हमारे जिन नेत्रों में प्यारे कृष्ण बस रहे हैं उनमें तुम निर्गुण निराकार 

ब्रह्म बसाने को कह रहे हो।

अपनो॥॥डारें तुम्हारा योग-शास्त्र तो एक बहुमूल्य वस्तु है उसे हम जैसी गंवार 

गोपियों के आगे क्यों व्यर्थ बरबाद कर रहे हो।

तुम्हारे॥॥खारे तुम्हारे लि हम अपने मीठे को खारा नहीं कर सकतीं प्यारे मोहन 

की मीठी याद को छोड़कर तुम्हारे नीरस निर्गुण ज्ञान का आस्वादन भला हम क्यों करने 

चलीं 

६३ केदारा 

फिर फिर कहा सिखावत बात।

प्रात काल उठि देखत ऊधो घर घर माखन खात॥

जाकी बात कहत हौ हम सों सो है हम तैं दूरि।

इहं हैं निकट जसोदानन्दन प्रान-सजीवनि भूरि॥

बालक संग लियें दधि चोरत खात खवावत डोलत।

सूर सीस नीचैं कत नावत अब नहिं बोलत॥८॥

शब्दार्थ

नावत झुकाते हो।

टिप्पणी 

जाकी बात॥॥दूरि जिस निर्गुण ब्रह्म की बात तुम हमारे सामने बना रहे 

हो वह तो हमसे बहुत दूर है  हमारे परिमित ज्ञान के परे है। 

सीस नीचें॥।बोलत अब क्यों नीचे को सिर कर लिया  कुछ बोलते क्यों नहीं 

६४ रामकली 

उधो मन नाहीं दस बीस।

एक हुतो सो गयौ स्याम संग को अवराधै ईस॥

सिथिल भं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।

स्वासा अटकिरही आसा लगि जीवहिं कोटि बरीस॥

तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के सकल जोग के ईस।

सूरदास रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥९॥

शब्दार्थ

हुतो था। अवराधै  आराधना करे उपासना करे। ईस निर्गुण ईश्वर।

सिथिल भं  निष्प्राण सी हो ग हैं। स्वासा  श्वास प्राण। बरीश  वर्ष का 

अपभ्रंश। पुरवौ मन  मन की इच्छा पूरी करो।

टिप्पणी

गोपियां कहती है मन तो हमारा एक ही है दस-बीस मन तो हैं नहीं कि 

एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है कृष्ण के साथ अब 

वह भी चला गया। तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की उपासना अब किस मन से करें 

स्वासा॥॥बरीस गोपियां कहती हैंयों तो हम बिना सिर की-सी हो ग हैं हम कृष्ण

वियोगिनी हैं तो भी श्याम-मिलन की आशा में इस सिर-विहीन शरीर में हम अपने प्राणों 

को करोड़ों वर्ष रख सकती हैं। 

सकल जोग के ईस क्या कहना तुम तो योगियों में भी शिरोमणि हो। यह व्यंग्य है।

६५ टोडी 

अंखियां हरि-दरसन की भूखी।

कैसे रहैं रूप-रस रांची ये बतियां सुनि रूखी॥

अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ये तौ नहिं झूखी।

अब इन जोग संदेसनि ऊधो अति अकुलानी दूखी॥

बारक वह मुख फेरि दिखावहुदुहि पय पिवत पतूखी।

सूर जोग जनि नाव चलावहु ये सरिता हैं सूखी॥१०॥

शब्दार्थ

रांची रंगी हुं अनुरूप। अवधि  नियत समय। झूखी  दुःख से पछता

खीजी। दुःखी दुःखित हु। बारक एक बार। पतूखी पत्तेश का छोटा-सा दाना 

टिप्पणी

अंखियां॥। रूखी जिन आंखों में हरि-दर्शन की भूल लगी हु है जो रूप-

रस मे रंगी जा चुकी हैं उनकी तृप्ति योग की नीरस बातों से कैसे हो सकती है 

अवधि॥॥।दूखी इतनी अधिक खीझ इन आंखों को पहले नहीं हु थी क्योंकि श्रीकृष्ण 

के आने की प्रतीक्षा में अबतक पथ जोहा करती थीं। पर उद्धव तुम्हारे इन योग के 

संदेशों से इनका दुःख बहुत बढ़ गया है।

जोग जनि॥।सूखी अपने योग की नाव तुम कहां चलाने आ हो सूखी रेत की नदियों में 

भी कहीं नाव चला करती है हम विरहिणी ब्रजांगनां को क्यों योग के संदेश देकर 

पीड़ित करते हो  हम तुम्हारे योग की अधिकारिणी नहीं हैं।

६६ मलार 

ऊधो हम लायक सिख दीजै।

यह उपदेस अगिनि तै तातो कहो कौन बिधि कीजै॥

तुमहीं कहौ इहां इतननि में सीखनहारी को है।

जोगी जती रहित माया तैं तिनहीं यह मत सोहै॥

कहा सुनत बिपरीत लोक में यह सब को कैहै।

देखौ धौं अपने मन सब को तुमहीं दूषन दैहै॥

चंदन अगरु सुगंध जे लेपत का विभूति तन छाजै।

सूर कहौ सोभा क्यों पावै आंखि आंधरी आंजै॥११॥

शब्दार्थ

सिख  शिक्षा उपदेश। तातो गरम। जती यति संन्यासी।

यह मत सोहै  यह निर्गुणवाद शोभा देता है। कैहै कहेगा। चंदन अगरु  मलयागिर चंदन 

विभूति भस्म भभूत। छाजै सोहती है।

टिप्पणी 

हम लायक हमारे योग्य हमारे काम की। अधिकारी देखकर उपदेश दो।

कहौ॥।कीजै तुम्हीं बता इसे किस तरह ग्रहण करे  विपरीत उलटा स्त्रियों 

को भी कठिन योगाभ्यास की शिक्षा दी जा रही है यह विपरीत बात सुनकर संसार क्या 

कहेगा  आंखि आंधरी आंजै अंधी स्त्री यदि आंखों में काजल लगा तो क्या वह उसे 

शोभा देगा  इसी प्रकार चंदन और कपूर का लेप करने वाली को स्त्री शरीर पर भस्म रमा 

ले तो क्या वह शोभा पायेगी 

६७ सारंग 

ऊधो मन माने की बात।

दाख छुहारो छांड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥

जो चकोर कों दे कपूर को तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरि काठ में बंधत कमल के पात॥

ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।

सूरदास जाकौ जासों हित सो ताहि सुहात॥१२॥

शब्दार्थ

अंगार अघात अंगारों से तृप्त होता है  प्रवाद है कि चकोर पक्षी 

अंगार चबा जाता है। कोरि छेदकर। पात पत्ता।

टिप्पणी 

अंगार अघात तजि अंगार न अघात भी पाठ है उसका भी यही अर्थ होता है 

अर्थात अंगार को छोड़कर दूसरी चीजों से उसे तृप्ति नहीं होती। तजि अंगार कि अघात 

भी एक पाठान्तर है। उसका भी यही अर्थ है।

६८ काफी 

निरगुन कौन देश कौ बासी।

मधुकर कहि समुझा सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥

को है जनक जननि को कहियत कौन नारि को दासी।

कैसो बरन भेष है कैसो केहि रस में अभिलाषी॥

पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी।

सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥१३॥

शब्दार्थ

निरगुन  त्रिगुण से रहित ब्रह्म। सौंह शपथ कसम। बूझति पूछती हैं।

जनक पिता। वरन वर्ण रंग। गांसी  व्यंग चुभने वाली बात।

टिप्पणी

गोपियां ऐसे ब्रह्म की उपासिकां हैं जो उनके लोक में उन्हीं के समान 

रहता हो जिनके पिता भी हो माता भी हो और स्त्री तथा दासी भी हो। उसका सुन्दर

वर्ण भी हो वेश भी मनमोहक हो और स्वभाव भी सरस हो। इसी लि वे उद्धव से पूछती हैं

अच्छी बात है हम तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म से प्रीति जोड़ लेंगी पर इससे पहले 

हम तुम्हारे उस निर्गुण का कुछ परिचय चाहती हैं। वह किस देश का रने वाला है उसके 

पिता का क्या नाम है उसकी माता कौन है को उसकी स्त्री भी है रंग गोरा है या 

सांवला वह किस देश में रहता है उसे क्या-क्या वस्तुं पसंद हैं यह सब बतला दो। 

फिर हम अपने श्यामसुन्दर से उस निर्गुण की तुलना करके बता सकेंगी कि वह प्रीति करने

योग्य है या नहीं।

पावैगो॥॥गांसी जो हमारी बातों का सीधा-सच्चा उत्तर न देकर चुभने वाली व्यंग्य 

की बाते कहेगा उसे अपने कि का फल मिल जायगा।

६९ नट 

कहियौ जसुमति की आसीस।

जहां रहौ तहं नंदलाडिले जीवौ कोटि बरीस॥

मुरली द दौहिनी घृत भरि ऊधो धरि ल सीस।

इह घृत तौ उनहीं सुरभिन कौ जो प्रिय गोप-अधीस॥

ऊधो चलत सखा जुरि आये ग्वाल बाल दस बीस।

अबकैं ह्यां ब्रज फेरि बसावौ सूरदास के ईस॥१४॥

शब्दार्थ

कोटि बरीस करोड़ों वर्ष। दोहिनी मिट्टी का बर्तन जिसमें दूध दुहा जाता 

है छोटी मटकिया। सुरभिन गाय। जो प्रिय गोप अधीस  जो गों ग्वाल-बालों के 

स्वामी कृष्ण को प्रिय थीं। जुरि आ  इकट्ठे हो ग।

टिप्पणी 

जहां रहौं॥।बरीस प्यारे नंदनंदन तुम जहां भी रहो सदा सुखी रहो 

और करोड़ों वर्ष चिरंजीवी रहो। नहीं आना है तो न आ मेरा वश ही क्या  मेरी 

शुभकामना सदा तुम्हारे साथ बनी रहेगी तुम चाहे जहां भी रहो।

मुरली॥।सीस यशोदा के पास और देने को है ही क्या अपने लाल की प्यारी वस्तुं

ही भेज रही हैं- बांसुरी और कृष्ण की प्यारी गौं का घी। उद्धव ने भी बडे प्रेम से 

मैया की भेंट सिरमाथे पर ले ली।

७० गोरी 

कहां लौं कहि ब्रज की बात।

सुनहु स्याम तुम बिनु उन लोगनि जैसें दिवस बिहात॥

गोपी गा ग्वाल गोसुत वै मलिन बदन कृसगात।

परमदीन जनु सिसिर हिमी हत अंबुज गन बिनु पात॥

जो कहुं आवत देखि दूरि तें पूंछत सब कुसलात।

चलन न देत प्रेम आतुर उर कर चरननि लपटात॥

पिक चातक बन बसन न पावहिं बायस बलिहिं न खात।

सूर स्याम संदेसनि के डर पथिक न उहिं मग जात॥१५॥

शब्दार्थ

विहात बीतते हैं। मलिन बदन  उदास। सिसिर हिमी हत  शिशिर ऋतु के 

पाले से मारे हु। बिनु पात  बिना पत्ते के। कुसलात  कुशल-क्षेम। बायस कौआ।

बलि भोजन का भाग।

टिप्पणी

परमदीन॥।पात सारे ब्रजबासी ऐसे श्रीहीन और दीन दिखा देते है जैसे 

शिशिर के पाले से कमल कुम्हला जाता है और पत्ते उसके झुलस जाते हैं।

पिक॥॥पावहिं कोमल और पपीहे विरहाग्नि को उत्तेजित करते हैं अतः बेचारे इतने 

अधिक कोसे जाते हैं कि उन्होंने वहां बसेरा लेना भी छोड़ दिया है।

बायस॥॥खात कहते हैं कि कौआ घर पर बैठा बोल रहा हो और उसे कुछ खाने को 

रख दिया जाय तो उस दिन अपना को प्रिय परिजन या मित्र परदेश से आ जाता है।

यह शकुन माना जाता है। पर अब को भी वहां जाना पसंद नहीं करते। वे बलि की तरफ

देखते भी नहीं। यह शकुन भी असत्य हो गया।

७१ मारू 

ऊधो मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।

बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥

प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।

माखन रोटी दह्यो सजायौ अति हित साथ खवावत॥

गोपी ग्वाल बाल संग खेलत सब दिन हंसत सिरात।

सूरदास धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हंसत ब्रजनाथ॥१६॥

शब्दार्थ

गोकुल तन  गोकुल की तरफ। तृनन की  वृक्ष-लता आदि की।

हित स्नेह। सिरात  बीतता था।

टिप्पणी 

निर्मोही मोहन को अपने ब्रज की सुध आ ग। व्याकुल हो उठे बाल्यकाल

का एक-एक दृष्य आंखों में नाचने लगा। वह प्यारा गोकुल वह सघन लतां की शीतल छाया 

वह मैया का स्नेह वह बाबा का प्यार मीठी-मीठी माखन रोटी और वह सुंदर सुगंधित दही

वह माखन-चोरी और ग्वाल बालों के साथ वह ऊधम मचाना  कहां गये वे दिन कहां ग वे

घड़ियां 

७२ मलार 

तबतें बहुरि न को आयौ।

वहै जु एक बेर ऊधो सों कछुक संदेसों पायौ॥

छिन-छिन सुरति करत जदुपति की परत न मन समुझायौ।

गोकुलनाथ हमारे हित लगि द्वै आखर न पठायौ॥

यहै बिचार करहु धौं सजनी इतौ गहरू क्यों लायौ।

सूर स्याम अब बेगि मिलौ किन मेघनि अंबर छायौ॥१७॥

शब्दार्थ

द्वै आखर  दो अक्षर छोटी-सी चिट्ठी। गहरू विलंब। किन क्यों नहीं।

टिप्पणी 

परत न मन समुजायो मन समझाने से भी नहीं समझता।

अब बेगि॥। छायौ घनघोर घटां घिर आ है। यह संकेत किया गया है कि 

कहीं इन्द्र तब का बदला न चुका बैठे। ब्रज को कौन जाने अबकी बार डुबा कर ही 

छोड़े।इसलि गोवर्द्धनधारी ये काली-काली घटनां देखकर तो ब्रज को बचाने के लि आ 

जा। 

७३ मलार 

अब या तनुहिं राखि कहा कीजै।

सुनि री सखी स्यामसुंदर बिनु बांटि विषम विष पीजै॥

के गिरि गिरि चढ़ि सुनि सजनी सीस संकरहिं दीजै।

के दहि दारुन दावानल जा जमुन धंसि लीजै॥

दुसह बियोग अरी माधव को तनु दिन-हीं-दिन छीजै।

सूर स्याम अब कबधौं मिलिहैं सोचि-सोचि जिय जीजै॥१८॥

शब्दार्थ

बांटि  पीसकर। सीस संकरहिं दीजै  यह सिर काट-कर शिव पर चढ़ा दिया 

जाय। दावानल  वन में लगी हु आग। छीजै  क्षीण होता है। जीजै  जी रहा है।

टिप्पणी 

शरीर का रखना व्यर्थ है अब। बिना स्यामसुन्दर के देह-धारण किये रहना 

अच्छा नहीं। ऐसे जीने से तो मर जाना ही अच्छा। शरीर नित्य क्षीण होता जाता हैं।

७४ ईमन 

आथ अनाथन की सुधि लीजै।

गोपी गा ग्वाल गौ-सुत सब दीन मलीन दिंनहिं दिन छीज॥

नैन नीर-धारा बाढ़ी अति ब्रज किन कर गहि लीजै।

इतनी बिनती सुनहु हमारी बारक तो पतियां लिखि दीजै॥

चरन कमल-दरसन नवनौका करुनासिन्धु जगत जसु लीजै।

सूरदास प्रभु आस मिलन की एक बार आवन ब्रज कीजै॥१९॥

शब्दार्थ

बारक तो  एक बार तो। दरसन नवनौका दर्शन रूपी न नाव।

टिप्पणी 

नैन नीर॥॥।लीजे आंसुं की धारा बाढ़ पर है। कौन जाने वह ब्रज को

किसी दिन डुबाकर रहे। जैसे तुमने पहले गोवर्द्धन उंगली पर उठा ब्रज की रक्षा कर ली

थी उसी प्रकार ब्रजवासियों के आंसुं की बाढ़ से फिर वहां चलकर अपनी लीलाभूमि का 

उद्धार करो।

विविध

कृष्ण-सुदामा-मैत्री

७५ बिलावल 

ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै।

सुनि री सुंदरि दीनबंधु बिनु कौन मिता मानै॥

कहं हौं कृपन कुचील कुदरसन कहं जदुनाथ गुसां।

भैंट।ह्यौ हृदय लगा प्रेम सों उठि अग्रज की नां॥

निज आसन बैठारि परम रुचि निजकर चरन पखारे।

पूंछि कुसल स्यामघन सुंदर सब संकोच निबारे॥

लीन्हें छोरि चीर तें चार कर गहि मुख में मेले।

पूरब कथा सुना सूर प्रभु गुरु-गृह बसे अकेले॥१॥

शब्दार्थ

मिता मित्रता। कृपन दीन गरीब। कुचील  मैले कपड़े पहनने वाला।

कुदरसन कुरूप। सब संकोच निवारे  निःसंकोच होकर। चीर  वस्त्र। मेले  डाल दिये 

पूरब कथा  बाल्यकाल की बातें।

टिप्पणी 

निज कर चरन पखारे अपने हाथ से मेरे पैर धोये। इस प्रसंग पर कवि 

नरोत्तमदास का बड़ा ही सुंदर सवैया है 

कैसे बिहाल बेवांन सों भये कंटक-जाल गड़े पग जोये। 

हाय महादुख पाये सखा तुम आये इतै न कितै दिन खोये॥

देखि सुदामा की दीन दसा करुना करि कैं करुनाकर रोये।

पानी परात कौ हाथ छुयौ नहिं नैनन के जल सों पग धोये॥

लीन्हें॥॥मेले सुदामा की पत्नी ने एक फटे पुराने चिथड़े में श्रीकृष्ण के लि

भेंट-स्वरूप थोड़े-से चावल बांध दि थे। श्रीकृष्ण ने सुदामा से पूछा क्यों भैया

मेरे लि भाभी ने कुछ दिया है या नहीं  बेचारे ब्राह्मण से लज्जा और संकोच के 

मारे कुछ बोलते न बना। वह फटी पोटली बगल में और जोर से दबा ली। कृष्ण ने

पकड़कर वह खींच ही ली और खोलकर वे कच्चे चावल मुट्ठी भर-भर बड़े प्रेम से 

चबाने लगे।

७६ विदुर के अतिथि 

हरि तुम क्यों न हमारैं आये।

षटरस व्यंजन छाड़ि रसौ साग बिदुर घर खाये॥

ताकी कुटिया में तुम बैठे कौन बड़प्पन पायौ।

जाति पांति कुलहू तैं न्यारो है दासी कौ जायौ॥

मैं तोहि कहौं अरे दुरजोधन सुनि तू बात हमारी।

बिदुर हमारो प्रान पियारो तू विषया अधिकारी॥

जाति-पांति हौं सबकी जानौं भक्तनि भेद न मानौं।

संग ग्वालन के भोजन कीनों एक प्रेमव्रत ठानौं॥

जहं अभिमान तहां मैं नाहीं भोजन बिषा सो लागे।

सत्य पुरुष बैठ्यो घट ही में अभिमानी को त्यागे॥ 

जहं जहं भीर परै भक्तन पै पै पयादे धां।

भक्तन के हौं संग फिरत हौं भक्तनि हाथ बिकां॥

भक्तबछलता बिरद हमारो बेद उपनिषद गायौ।

सूरदास प्रभु निजजन-महिमा गावत पार न पायौ॥१॥

शब्दार्थ

जायौ गर्भ से उत्पन्नपुत्र। विषया  माया विषय-वासना। 

ठानैं पक्का कर लिया है। घट शरीर। भीर कष्ट। भक्तवछलता भक्त-वत्सलता भक्तों 

पर प्यार करना। बिरद  गाना

टिप्पणी 

अभिमानी दुर्योधन का राजसी सम्मान और षटरस व्यंजन छोड़कर श्रीकृष्ण ने 

विदुर के यहां बिना ही निमंत्रण के अलौना साग बड़े प्रेम से खाया था। यह पद उसी 

प्रसंग का है।

सत्य पुरुष॥।त्यागै अंतःकरण में विराजमान सत्यरूपी नारायण अभिमानी के पास कभी 

नहीं जाता। जहां अहं भाव है वहां ईश्वर भाव का काम ही क्या  भगवान् तो प्रेम के 

भूखे हैं राजसी सम्मान के नहीं। गर्गभंजन गोविन्द को अभिमानी दुर्योधन का मान भंग 

तो करना ही था इसीलि उसका आतिथ्य त्याग दिया और विदुर की कुटिया में जाकर 

रूखा-सूखा भोजन बड़े प्रेम से किया।

७७ प्रतिज्ञा-भंग 

जो पै हरिहिंन शस्त्र गहां।

तौ लाजौं गंगा जननी कौं सांतनु-सुतत कहां॥

स्यंदन खंडि महारथ खंडौं कपिध्वज सहित डुलां।

इती न करौं सपथ मोहिं हरि की छत्रिय गतिहिं न पां॥

पांडव-दल सन्मुख ह्वै धां सरिता रुधिर बहां।

सूरदास रणविजयसखा कौं जियत न पीठि दिखां॥१॥

शब्दार्थ

स्यंदन रथ। खंडि टुकड़े-टुकड़े करके। कपिधवज  अर्जुन के रथ की 

पताका जिस पर हनुमान का चित्र था। डुलां  विचलित कर दूं। विजयसखा  अर्जुन के

सखा श्रीकृष्ण। 

टिप्पणी 

जब अर्जुन श्रीकृष्ण को रण का निमंत्रण देने गये तब उन्होंने अर्जुन से 

कहा मैं तुम्हारे साथ रहूंगा अवश्य पर हाथ में शस्त्र नहीं लूंगा।  उसी

प्रतिज्ञा के अनुसार श्रीकृष्ण ने रथ हांकना स्वीकार किया। इधर भीष्म पितामह ने

प्रतिज्ञा की कि मैं अवश्य कृष्ण की प्रतिज्ञा तोड़ डालूंगा उन्हें शस्त्र लेना ही 

पड़ेगा। यह पद उसी प्रसंग का है।

तौ॥॥कों भीष्म पितामह ने गंगा के गर्भ से जन्म लिया था। कहते है यदि मैंने 

इतना न किया तो गंगा का पुत्र नहीं गंगा के दूध लजाने वाला कुपुत्र कहा जांगा।

सांतनु-सुत भीष्म के पिता का नाम महाराज शांतनु था। इती॥॥पां जिन्हें वे 

परास्त करना चाहते है उसी की शपथ लेते हैं। हरि के ही बल पर हराना चाहते हैं।

७८ सारंग 

मो परतिग्या रहै कि जा।

इत पारथ कोप्यौ है हम पै उत भीषम भटरा॥

रथ तै उतरि चक्र धरि कर प्रभु सुभटहिं सन्मुख आयौ।

ज्यों कंदर तें निकसि सिंह झुकि गजजुथनि पै धायौ॥

आय निकट श्रीनाथ बिचारी परी तिलक पर दीठि।

सीतल भ चक्र की ज्वाला हरि हंसि दीनी पीठि॥

जय जय जय जनबत्सल स्वामी सांतनु-सुत यौं भाखै।

तुम बिनु ऐसो कौन दूसरो जौं मेरो प्रन राखै॥

साधु साधु सुरसरी-सुवन तुम मैं प्रन लागि डरां।

सूरदास भक्त दो दिसि का पै चक्र चलां॥२॥

शब्दार्थ

परतिग्या  प्रतिज्ञा प्रण। पारथ पार्थ पृथा के पुत्र अर्जुन। 

भटरा  योद्धां में श्रेष्ठ। कंदर  कंदरा गुफा। झुकि  झपटकर।

दीठी  दृष्टि नजर। भाखै कहता है। साधु साधु धन्य हो। सुरसरी-सुवन गंगा के

पुत्र भीष्म। दिसि तरफ।

टिप्पणी

ज्यों॥।धायौ जैसे गुफा से ललकारा हुआ क्रुद्ध शेर झपटकर हाथियों के 

झुंडों पर दौड़ता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण बड़े-बड़े योद्धां पर आक्रमण करते हु 

रथ से उतर-कर भीष्म की ओर दौड़े।

हरि हंसि दीनीं पीठि श्रीकृष्ण ने हंसकर स्वयं ही पीठ दिखा दी खुद ही हार 

स्वीकार कर ली।

मैं प्रन लागि डरां मैं अपने भक्तों के प्रण से बहुत डरता हूं।

७९ देश

वा पटपीत की फहरानि।

कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरति वह बानि॥

रथ तें उतरि अवनि आतुर ह्वै कचरज की लपटानि।

मानौं सिंह सैल तें निकस्यौ महामत्त गज जानि॥

जिन गुपाल मेरा प्रन राख्यौ मेटि वेद की कानि।

सो सूर सहाय हमारे निकट भये हैं आनि॥३॥

शब्दार्थ

पटपीथ पीताम्बर। कर धरी हाथ में लेकर। बानि बानिक रूप।

अवनि भूमि। आतुर ह्वै  जल्दी में घबरा-कर। कच बाल। रज धूल सैल पर्वत।

कानि  मर्यादा।

हाथ में सुदर्शन चक्र लिये हु वह तेजी से दौड़ना को कैसे भूल सकता है वह शोभा ही

निराली है। रथ से कूदकर भीष्म की ओर झपट रहे हैं। पीतांबर फहरा रहा है। अलकों

में धूल लगी हु है। श्रीकृष्ण उस समय ऐसे दिखा देते हैं मानो किसी महामदोद्धत 

गजेन्द्र पर को क्रुद्ध केसरी आक्रमण कर रहा हो।

हरि-सुमिरन

८० बिलावल 

हरि हरि हरि सुमिरन करौ।

हरि चरनारबिंद उर धरौं॥

हरि की कथा हो जब जहां।

गंगाहू चलि आवै तहां॥

जमुना सिन्धु सरस्वति आवै।

गोदावरी विलंब न लाबै॥

सर्व तीर्थ को बासा तहां।

सूर हरि-कथा होवे जहां॥१॥

८१

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे।

जैसे उड़ि जहाज की पंछि, फिरि जहाज पर आवै॥

कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।

परम गंग को छाँड़ि पियसो, दुरमति कूप खनावै॥

जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खावै।

‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

८२

चरन कमल बंदौ हरिराई ।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,अंधे को सब कछु दरसाई ॥१॥

बहरो सुने मूक पुनि बोले,रंक चले सिर छत्र धराई ।

‘सूरदास’ स्वामी करुणामय, बारबार बंदौ तिहिं पाई ॥२॥ 

८३

तिहारो दरस मोहे भावे श्री यमुना जी ।

श्री गोकुल के निकट बहत हो, लहरन की छवि आवे ॥१॥

सुख देनी दुख हरणी श्री यमुना जी, जो जन प्रात उठ न्हावे ।

मदन मोहन जू की खरी प्यारी, पटरानी जू कहावें ॥२॥

वृन्दावन में रास रच्यो हे, मोहन मुरली बजावे ।

सूरदास प्रभु तिहारे मिलन को, वेद विमल जस गावें ॥३॥ 

८४

दृढ इन चरण कैरो भरोसो, दृढ इन चरणन कैरो ।

श्री वल्लभ नख चंद्र छ्टा बिन, सब जग माही अंधेरो ॥ 

साधन और नही या कलि में, जासों होत निवेरो ॥

सूर कहा कहे, विविध आंधरो, बिना मोल को चेरो ॥

८५

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।

मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?

कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।

पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात?

गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।

चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।

तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।

मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।

सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।

सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥

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