sanskrit slokas

महान संस्कृत श्लोक भावार्थ सहित sanskrit shlokas with meaning in Hindi

हमारे भारतीय संस्कृति में श्लोकों (संस्कृत श्लोक) का बहुत ही महत्त्व है। हम भगवन की प्रार्थना करने के लिए इन्ही श्लोको तथा मंत्रो का उपयोग करते है।

यहाँ पर हमारे वेद-पुराणों व असंख्य धार्मिक ग्रंथों में ऋषि – मुनियों ने ढेरों ज्ञान की बातें संस्कृत श्लोकों के रूप में लिखी हैं। आइये आज हम ज्ञान के उस अथाह सागर में से कुछ अनमोल रत्नों को देखते और पढ़ते हैं। sanskrit shlokas with meaning in Hindi

हम सब संस्कृत श्लोक (Sanskrit shlokas with meaning in Hindi) को पढ़ कर इसके वास्तविक ज्ञान को अपने जीवन में उतार कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं।


72 Sanskrit shlokas with meaning in Hindi

संस्कृत श्लोक: 1

काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च।

अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं।।

भावार्थ: एक विद्यार्थी के पांच लक्षण होते हैं। कौवे की तरह हमेशा कुछ नया जानने की प्रबल इच्छा। बगुले की तरह ध्यान व एक्राग्रता। कुत्ते की जैसी नींद, जो एक आहट में भी खुल जाए। अल्पाहारी मतलब आवश्यकतानुसार खाने वाला और गृह-त्यागी।


संस्कृत श्लोक: 2

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

भावार्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, जो सृष्टि निर्माता की तरह परिवर्तन के चक्र को चलाते हैं। गुरु ही विष्णु अर्थात रक्षक हैं। गुरु ही शिव यानी विध्वंसक हैं, जो कष्टों से दूर कर मार्गदर्शन करते हैं। गुरु ही धरती पर साक्षात परम ब्रह्मा के रूप में अवतरित हैं। इसलिए, गुरु को सादर प्रणाम।


संस्कृत श्लोक: 3

न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि।

व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।

भावार्थ: एक ऐसा धन जिसे न चोर चुराकर ले जा सकता है, न ही राजा छीन सकता है, जिसका न भाइयों में बंटवार हो सकता है, जिसे न संभालना मुश्किल व भारी होता है और जो अधिक खर्च करने पर बढ़ता है, वो विद्या है। विद्या सभी धनों में से सर्वश्रेष्ठ धन है।


संस्कृत श्लोक: 4

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||

भावार्थ:- मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसका आलस्य है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा)कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |


संस्कृत श्लोक: 5

अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम

पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

भावार्थ:- अपमान करके दान देना, विलंब(देर) से देना, मुँह फेर के देना, कठोर वचन बोलना और कुछ देने के बाद पश्चाताप करना| ये पांच क्रियाएं आपके दान को दूषित कर देती हैं।


संस्कृत श्लोक: 6

यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !

तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि !!

भावार्थ:- वह व्यक्ति जो अलग अलग जगहों या देशो में घूमकर (पंडितों) विद्वानों की सेवा करता है, उसकी बुद्धि का विस्तार(विकास) उसी प्रकार होता है, जैसे तेल की बूंद पानी में गिरने के बाद फ़ैल जाती है|


संस्कृत श्लोक: 7

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन ,

विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन ||

भावार्थ:- कुंडल पहन लेने से कानों की शोभा नहीं बढ़ती, अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है | हाथ, कंगन धारण करने से सुन्दर नहीं होते, उनकी शोभा दान करने से बढ़ती हैं | सज्जनों का शरीर भी चन्दन से नहीं अपितु परहित में किये गये कार्यों से शोभित होता हैं।


संस्कृत श्लोक:8

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् |

एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ||

भावार्थ:- जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता है उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ (मेहनत) के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है|


संस्कृत श्लोक:9

परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः !

अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् !!

भावार्थ:- कोई अपरिचित व्यक्ति भी अगर आपकी मदद करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दे और अगर परिवार का कोई अपना सदस्य भी आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दे।

 ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमारी हो जाए, तो वह हमें तकलीफ पहुंचाती है, जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है|


संस्कृत श्लोक:10

पुस्तकस्था तु या विद्या,परहस्तगतं च धनम् 

कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् ।।

भावार्थ:- पुस्तक में रखी विद्या तथा दूसरे के हाथ में गया धन, ये दोनों ही ज़रूरत के समय हमारे किसी भी काम नहीं आया करते|


संस्कृत श्लोक:11

विद्या मित्रं प्रवासेषु,भार्या मित्रं गृहेषु च |

व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च ||

भावार्थ:- विदेश में ज्ञान, घर में अच्छे स्वभाव और गुणस्वरूपा पत्नी, औषध रोगी का ,तथा धर्म मृतक का सबसे बड़ा मित्र होता है |


संस्कृत श्लोक:12

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् |

वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ||

भावार्थ:- अचानक आवेश(जोश) में आ कर बिना सोचे समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए | क्योंकि विवेक हीनता सबसे बड़ी विपत्तियों का कारण होती है | इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है, गुणों से आकृष्ट होने वाली माँ लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है |


संस्कृत श्लोक:13

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः !

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति !!

भावार्थ:- जिन मनुष्यों में न विद्या का निवास है, न मेहनत का भाव, न दान की इच्छा, और न ज्ञान का प्रभाव, न गुणों की अभिव्यक्ति और न धर्म पर चलने का संकल्प, वे मनुष्य नहीं, वे मनुष्य रूप में जानवर ही धरती पर विचरते हैं।


संस्कृत श्लोक:14

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि ।

एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते ॥

भावार्थ:- बिना दया (करुणा) के किये गए काम का कोई फल नहीं मिलता, ऐसे काम में धर्म नहीं होता| जहाँ दया नही होती वहां वेद भी अवेद बन जाते हैं|


संस्कृत श्लोक:15

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः !

उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् !!

भावार्थ:- निम्न(छोटे) कोटि के लोग सिर्फ धन की इच्छा रखते हैं, मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा रखता है, वहीँ एक उच्च कोटि के व्यक्ति के लिए सिर्फ सम्मान ही मायने रखता है, सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है|


संस्कृत श्लोक: 16

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥

भावार्थ:- ज्ञान विनम्रता प्रदान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से धन प्राप्त होता है जिससे व्यक्ति धर्म के कार्य करता हैं और सुखी रहता है|


संस्कृत श्लोक: 17

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति !

उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् !!

भावार्थ:- जब तक काम पूरे नहीं होते हैं, तब तक लोग दूसरों की प्रशंसा करते हैं। काम पूरा होने के बाद लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं । ठीक उसी तरह जैसे, नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है.


संस्कृत श्लोक: 18

शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः !

वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा !!

भावार्थ:- सौ लोगो में एक शूरवीर होता है, हजार लोगो में एक विद्वान होता है, दस हजार लोगो में एक अच्छा वक्ता होता है वही लाखो में बस एक ही दानी होता है|


संस्कृत श्लोक: 19

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन !

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते !!

भावार्थ:- एक विद्वान और राजा की कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है|


संस्कृत श्लोक: 20

अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात् ।

तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित् ॥

भावार्थ:- आग से सींचे गए पेड़ कभी बड़े नहीं होते, उसी प्रकार सत्य के बिना धर्म की स्थापना भी संभव नहीं है|


संस्कृत श्लोक: 21

ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

भावार्थ:- हम ईश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं, जिसने इस संसार को उत्पन्न किया है, जो पूजनीय है, जो ज्ञान का भंडार है, जो पापों तथा अज्ञान की दूर करने वाला हैं- वह हमें प्रकाश दिखाए और हमें सत्य पथ पर ले जाए।


संस्कृत श्लोक: 22

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः !

न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा !!

भावार्थ:- जो माता पिता अपने बच्चो को शिक्षा से वंचित रखते हैं, ऐसे माँ बाप बच्चो के शत्रु के समान है| विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह हंसो के बीच एक बगुले के सामान है|


संस्कृत श्लोक: 23

सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् !

सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् !!

भावार्थ:- सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ से, और विद्यार्थी को सुख कहाँ से, सुख की इच्छा रखने वाले को विद्या और विद्या की इच्छा रखने वाले को सुख का त्याग कर देना चाहिए ।


संस्कृत श्लोक: 24

मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम् ।

दंपत्यो कलहं नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागतः ॥

भावार्थ:- जहाँ मूर्ख को सम्मान ना मिलता हो, जहाँ अनाज अच्छे तरीके से रखा जाता हो और जहाँ पति-पत्नी के बीच में लड़ाई नहीं होती हो, वहाँ लक्ष्मी खुद आ जाती है|


संस्कृत श्लोक: 25

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।

काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

भावार्थ:- लोगों की निंदा (बुराई) किये बिना दुष्ट (बुरे) व्यक्तियों को आनंद नहीं मिलता है । जैसे की  कौवा सब रसों का भोग करता है परंतु गंदगी के बिना उसकी संतुष्टि नहीं होती है ।


संस्कृत श्लोक: 26

नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यं त्वं एव तनुषे चेत।

विश्वस्मिन अधुना अन्य:कुलव्रतम पालयिष्यति क:

भावार्थ:- ऐ हंस, यदि तुम दूध और पानी में फर्क करना छोड़ दोगे तो तुम्हारे कुलव्रत का पालन इस विश्व मे कौन करेगा। यदि बुद्धिमान व्यक्ति ही इस संसार मे अपना कर्त्तव्य त्याग देंगे तो निष्पक्ष (impartial) व्यवहार कौन करेगा।


संस्कृत श्लोक: 27

दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।

नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।

भावार्थ:- दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही हमेशा दूसरे के कार्य को बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहा कभी भी पेट भरने के लिए कपड़े नहीं काटता।


संस्कृत श्लोक: 28

न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:

व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।

भावार्थ:- न कोई किसी का मित्र होता है, न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं या बनाये जाते है।


संस्कृत श्लोक: 29

भूमे:गरीयसी माता,स्वर्गात उच्चतर:पिता।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी।।

भावार्थ:- भूमि से श्रेष्ठ माता है, स्वर्ग से ऊंचे पिता हैं, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।


संस्कृत श्लोक: 30

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमतां।

व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।

भावार्थ:- बुद्धिमान लोग काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने में अपना समय व्यतीत करते हैं, जबकि मूर्ख लोग निद्रा,कलह (लड़ाई) और (व्यसनों) बुरी आदतों में अपना समय बिताते हैं।

संस्कृत श्लोक: 31

सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं प्रियम।

प्रियं च नानृतं ब्रूयात एष धर्म: सनातन:।।

भावार्थ:- सत्य बोलो, प्रिय बोलो,अप्रिय लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।


संस्कृत श्लोक: 32

शैले शैले न माणिक्यं,मौक्तिम न गजे गजे।

साधवो नहि सर्वत्र,चंदन न वने वने।।

भावार्थ:- प्रत्येक पर्वत पर अनमोल रत्न नहीं होते, प्रत्येक हाथी के मस्तक में मोती नहीं होता। सज्जन लोग सब जगह नहीं होते और प्रत्येक वन में चंदन भी नही पाया जाता है।


संस्कृत श्लोक: 33

पृथ्वियां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम सुभाषितं।

मूढ़े: पाधानखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

भावार्थ:- पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल,अन्न और शुभ वाणी ।परन्तु कुछ मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न की संज्ञा देते हैं।


संस्कृत श्लोक: 34

काम क्रोध अरु स्वाद, लोभ शृंगारहिं कौतुकहिं।

अति सेवन निद्राहि, विद्यार्थी आठौ तजै।।

भावार्थ: इस श्लोक के माध्यम से विद्यार्थियों को 8 चीजों से बचे रहने के लिए कहा गया है। काम, क्रोध, स्वाद, लोभ, शृंगार, मनोरंजन, अधिक भोजन और नींद  को त्यागना जरूरी है।


संस्कृत श्लोक: 35

 विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

भावार्थ: विद्या से विनय अर्थात विवेक व नम्रता मिलती है, विनय से मनुष्य को पात्रता मिलती है यानी पद की योग्यता मिलती है। वहीं, पात्रता व्यक्ति को धन देती है। धन फिर धर्म की ओर व्यक्ति को बढ़ाता और धर्म से सुख मिलता है। इस मतलब यह हुआ कि जीवन में कुछ भी हासिल करने के लिए विद्या ही सभी के लिए एक मूल आधार है।


संस्कृत श्लोक: 36

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनं:।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।

भावार्थ: बड़े-बुजुर्गों का अभिवादन अर्थात नमस्कार करने वाले और बुजुर्गों की सेवा करने वालों की 4 चीजें हमेशा बढ़ती रहती हैं। ये 4 चीजें हैं: आयु, विद्या, यश और बल। इसी वजह से हमेशा वृद्ध और स्वयं से बड़े लोगों की सेवा व सम्मान करना चाहिए।


संस्कृत श्लोक: 37

 उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।

भावार्थ: महज इच्छा रखने भर से कोई कार्य पूरा नहीं होता है , बल्कि उसके लिए उद्यम अर्थात मेहनत करना जरूरी होता है। ठीक उसी तरह जैसे शेर के मुंह में सोते हुए हिरण खुद-ब-खुद नहीं आ जाता, बल्कि उसे शिकार करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है।


संस्कृत श्लोक: 38

 यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।

चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता।।

भावार्थ: साधु यानी अच्छे व्यक्ति के मन में जो होता है, वो वही बात करता है। वचन में जो होता है यानी जैसा बोलता है, वैसा ही करता है। इनके मन, वचन और कर्म में हमेशा ही एकरूपता व समानता होती है। इसी को अच्छे व्यक्ति की पहचान माना जाता है। अच्छे व्यक्ति के कथनी और करनी एक सामान होती है |


संस्कृत श्लोक: 39

 षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।

निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

भावार्थ: अवगुण मनुष्य के लिए पतन की वजह बनते हैं। ये अवगुण हैं, नींद, तन्द्रा (थकान), भय, गुस्सा, आलस्य और कार्य को टालने की आदत होती है।


संस्कृत श्लोक: 37

 देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:।

गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः।।

भावार्थ: देवताओं के रूठ जाने पर गुरु रक्षा करते हैं, किंतु गुरु रूठ जाए, तो उस व्यक्ति के पास कोई नहीं होता। गुरु ही रक्षा करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। इसका मतलब यह है कि अगर पूरा विश्व व भाग्य भी किसी से विमुख हो जाए, तो गुरु की कृपा से सब ठीक हो सकता है। गुरु सभी मुश्किलों को दूर कर सकते हैं, लेकिन अगर गुरु ही नाराज हो जाए, तो कोई अन्य व्यक्ति मदद नहीं कर सकता।


संस्कृत श्लोक: 40

रूप यौवन सम्पन्नाः विशाल कुल सम्भवाः।

विद्याहीनाः न शोभन्ते निर्गन्धाः इव किंशुकाः।।

भावार्थ: अच्छा रूप, युवावस्था और उच्च कुल में जन्म लेने मात्र से कुछ नहीं होता। अगर व्यक्ति विद्याहीन हो, तो वह पलाश के फूल के समान हो जाता है, जो दिखता तो सुंदर है, लेकिन उसमें कोई खुशबू नहीं होती। अर्थात मनुष्य की असली खुशबू व पहचान विद्या व ज्ञान ही है।


संस्कृत श्लोक: 41

 अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

भावार्थ: छोटे चित यानी छोटे मन वाले लोग हमेशा यही गिनते रहते हैं कि यह मेरा है, वह उसका है, लेकिन उदारचित अर्थात बड़े मन वाले लोग संपूर्ण धरती को अपने परिवार के समान मानते हैं।


संस्कृत श्लोक: 42

मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं मुखे।

हठी चैव विषादी च परोक्तं नैव मन्यते।।

भावार्थ: इस श्लोक में कहा गया है कि मूर्खों की पांच पहचान होती हैं। सबसे पहला अहंकारी होना, दूसरा हमेशा कड़वी बात करना, तीसरी पहचान जिद्दी होना, चौथा हर समय बुरी-सी शक्ल बनाए रखना और पांचवां दूसरों का कहना न मानना। श्लोक इन सभी पांच चीजों से बचने की प्रेरणा देता है।


संस्कृत श्लोक: 43

 अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।

पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

भावार्थ: अपमान व अनादर के भाव से दान देना, देर से दान देना, मुंह फेरकर दान देना, कठोर व कटु वचन बोलकर दान देना और दान देने के बाद पछतावा करना। ये सभी पांच बातें दान को पूरी तरह दूषित कर देती हैं।

संस्कृत श्लोक: 44

 सुलभा: पुरुषा: राजन्‌ सततं प्रियवादिन:।

अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।।

भावार्थ: हमेशा प्रिय और मन को अच्छा लगने वाले बोल बोलने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन जो आपके हित के बारे में बोले और अप्रिय वचन बोल व सुन सके, ऐसे लोग मिलना दुर्लभ है।


संस्कृत श्लोक: 45

 दुर्जन: परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन।

मणिना भूषितो सर्प: किमसौ न भयंकर:।।

भावार्थ: दुर्जन अर्थात दुष्ट लोग भी अगर बुद्धिमान हों और विद्या प्राप्त कर लें, तो भी उनका परित्याग कर देना चाहिए। जैसे मणि युक्त सांप भी भयंकर होता है। इसका मतलब यह हुआ कि दुष्ट लोग कितने भी बुद्धिमान क्योंं न हों, उनकी संगत नहीं करनी चाहिए।


संस्कृत श्लोक: 46

 स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा !

सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् !!

भावार्थ:  किसी व्यक्ति को आप चाहे कितनी ही सलाह दे दो किन्तु उसका मूल स्वभाव नहीं बदलता ठीक उसी तरह जैसे ठन्डे पानी को उबालने पर तो वह गर्म हो जाता है लेकिन बाद में वह पुनः ठंडा हो जाता है.


संस्कृत श्लोक: 47

 अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते !

अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः !!

भावार्थ: हिन्दी अर्थ : किसी जगह पर बिना बुलाये चले जाना, बिना पूछे बहुत अधिक बोलते रहना, जिस चीज या व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए उस पर विश्वास करना मुर्ख लोगो के लक्षण होते है.


संस्कृत श्लोक: 48

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः !

चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता !!

भावार्थ:  अच्छे लोग वही बात बोलते है जो उनके मन में होती है. अच्छे लोग जो बोलते है वही करते है. ऐसे पुरुषो के मन, वचन व कर्म में समानता होती है.


 संस्कृत श्लोक: 49

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता !

निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता !!

भावार्थ:  किसी व्यक्ति के बर्बाद होने के 6 लक्षण होते है – नींद, गुस्सा, भय, तन्द्रा, आलस्य और काम को टालने की आदत.


संस्कृत श्लोक: 50

 द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् !

धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम् !!

भावार्थ:  दो प्रकार के लोगो के गले में पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक देना चाहिए. पहले वे व्यक्ति जो अमीर होते है पर दान नहीं करते और दूसरे वे जो गरीब होते है लेकिन कठिन परिश्रम नहीं करते.


पढ़े : रहीम दास के अनमोल वचन

संस्कृत श्लोक: 51

 यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !

तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि !!

भावार्थ:  वह व्यक्ति जो अलग – अलग जगहों या देशो में घूमता है और विद्वानों की सेवा करता है उसकी बुद्धि उसी तरह से बढती है जैसे तेल का बूंद पानी में गिरने के बाद फ़ैल जाता है.


संस्कृत श्लोक: 52

 परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः !

अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् !!

भावार्थ:  अगर कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी सहायता करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दे वही अगर आपका परिवार का व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दे. ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में चोट लगने पर हमें तकलीफ पहुँचती है वही जंगल की औषधि हमारे लिए फायदेमंद होती है.


संस्कृत श्लोक: 53

 येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः !

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति !!

भावार्थ: जिन लोगो के पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं होता. ऐसे लोग इस धरती के लिए भार है और मनुष्य के रूप में जानवर बनकर घूमते है.


संस्कृत श्लोक: 54

 अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः !

उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् !!

भावार्थ:  निम्न कोटि के लोगो को सिर्फ धन की इच्छा रहती है, ऐसे लोगो को सम्मान से मतलब नहीं होता. एक मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा करता है वही एक उच्च कोटि के व्यक्ति के सम्मान ही मायने रखता है. सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है.


 संस्कृत श्लोक: 55

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति !

उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् !!

भावार्थ:  जिस तरह नदी पार करने के बाद लोग नाव को भूल जाते है ठीक उसी तरह से लोग अपने काम पूरा होने तक दूसरो की प्रसंशा करते है और काम पूरा हो जाने के बाद दूसरे व्यक्ति को भूल जाते है.


संस्कृत श्लोक: 56

 न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि !

व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् !!

भावार्थ:  इसे न ही कोई चोर चुरा सकता है, न ही राजा छीन सकता है, न ही इसको संभालना मुश्किल है और न ही इसका भाइयो में बंटवारा होता है. यह खर्च करने से बढ़ने वाला धन हमारी विद्या है जो सभी धनो से श्रेष्ठ है.


संस्कृत श्लोक: 57

 शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः !

वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा !!

भावार्थ:  सौ लोगो में एक शूरवीर होता है, हजार लोगो में एक विद्वान होता है, दस हजार लोगो में एक अच्छा वक्ता होता है वही लाखो में बस एक ही दानी होता है.


संस्कृत श्लोक: 58

 विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन !

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते !!

भावार्थ: एक राजा और विद्वान में कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि एक राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है.


संस्कृत श्लोक: 59

 आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः !

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति !!

भावार्थ : मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है. मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र परिश्रम होता है क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं रहता.


संस्कृत श्लोक: 60

 यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् !

एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति !!

भावार्थ: जिस तरह बिना एक पहिये के रथ नहीं चल सकता ठीक उसी तरह से बिना पुरुषार्थ किये किसी का भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता.


पढ़े : कबीर दास के अनमोल वचन

संस्कृत श्लोक: 61

बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः !

श्रुतवानपि मूर्खो सौ यो धर्मविमुखो जनः !!

भावार्थ: जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है वह व्यक्ति बलवान होने पर भी असमर्थ, धनवान होने पर भी निर्धन व ज्ञानी होने पर भी मुर्ख होता है.


संस्कृत श्लोक: 62

 जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं !

मानोन्नतिं दिशति पापमपा करोति !!

भावार्थ: अच्छे दोस्तों का साथ बुद्धि की जटिलता को हर लेता है, हमारी बोली सच बोलने लगती है, इससे मान और उन्नति बढती है और पाप मिट जाते है.


संस्कृत श्लोक: 63

 चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः !

चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः !!

भावार्थ : इस दुनिया में चन्दन को सबसे अधिक शीतल माना जाता है पर चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होती है लेकिन एक अच्छे दोस्त चन्द्रमा और चन्दन से शीतल होते है.


संस्कृत श्लोक: 64

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् !

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् !!

भावार्थ: यह मेरा है और यह तेरा है, ऐसी सोच छोटे विचारो वाले लोगो की होती है. इसके विपरीत उदार रहने वाले व्यक्ति के लिए यह पूरी धरती एक परिवार की तरह होता है.


संस्कृत श्लोक: 65

पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं च धनम् !

कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् !!

भावार्थ:  किताब में रखी विद्या व दूसरे के हाथो में गया हुआ धन कभी भी जरुरत के समय काम नहीं आते.


संस्कृत श्लोक: 66

 विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च !

व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च !!

भावार्थ: विद्या की यात्रा, पत्नी का घर, रोगी का औषधि व मृतक का धर्म सबसे बड़ा मित्र होता है.


संस्कृत श्लोक: 67

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् !

वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः !!

भावार्थ: बिना सोचे – समझे आवेश में कोई काम नहीं करना चाहिए क्योंकि विवेक में न रहना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. वही जो व्यक्ति सोच – समझ कर कार्य करता है माँ लक्ष्मी उसी का चुनाव खुद करती है.


संस्कृत श्लोक: 68

 उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः !

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः !!

भावार्थ: दुनिया में कोई भी काम सिर्फ सोचने से पूरा नहीं होता बल्कि कठिन परिश्रम से पूरा होता है. कभी भी सोते हुए शेर के मुँह में हिरण खुद नहीं आता.


संस्कृत श्लोक: 69

 विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् !

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् !!

भावार्थ: विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता से योग्यता आती है व योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है और सुखी रहते है.


संस्कृत श्लोक : 70

 माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः !

न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा !!

भावार्थ: जो माता – पिता अपने बच्चो को पढ़ाते नहीं है ऐसे माँ – बाप बच्चो के शत्रु के समान है. विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह वहां हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है.


संस्कृत श्लोक : 72

 सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् !

सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् !!

भावार्थ: सुख चाहने वाले को विद्या नहीं मिल सकती है वही विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता. इसलिए सुख चाहने वालो को विद्या का और विद्या चाहने वालो को सुख का त्याग कर देना चाहिए।


Sanskrit shlokas with meaning in Hindi संस्कृत श्लोक भावार्थ सहित

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